अपने ही गाँव में

विपिन बिहारी

अपने ही गाँव में

विपिन बिहारी

और अधिकविपिन बिहारी

    होने लगता हूँ मैं अजनबी

    अपने ही गाँव में

    देखने लगते हैं

    मेरे ही रिश्तेदार

    घूर-घूर कर

    देखता चला जाता हूँ मैं भी

    अपना गाँव

    एक-एक गली

    एक-एक दरवाज़ा

    अक्सर टीसती है मुझे

    अजनबी होते चले जाने की पीड़ा

    बतियाने की कोशिश करता हूँ

    पेड़ों-पौधों-खेत-खलिहानों से

    मौन होते हैं वे

    थक जाती हैं मेरी कोशिशें

    लुटा-पिटा-सा

    अँटने लगता हूँ अपने ही खोल में

    फिर दूर होने लगता है गाँव

    मुझसे

    मेरे ज़ेहन से

    मेरे साये से

    पिछली रोटी

    बाबूजी चूक जाते थे कहीं

    चीख़ पड़ती थी माँ उन पर

    खाई है तुमने पिछली रोटी

    परथन की

    चूकते रहे हो बार-बार

    इतना कहती हूँ फिर भी

    पत्नी से कहता हूँ मैं भी

    खिलाना नहीं मुझे

    पिछली रोटी

    चूक जाऊँगा कहीं पर तो

    तुम भी चीख़ोगी माँ की तरह

    दोगी उलाहना

    पिछली रोटी का

    पत्नी हँसती है आधुनिक हँसी

    अन्न पिछला होता है

    अगला

    अन्न अन्न होता है

    जो भरता है पेट

    इतने दक़ियानूस कैसे हो गए

    आज के ज़माने में

    देखता हूँ चौंक कर उसे

    उसके सफ़ेद दाँतों को

    उसके जूड़ों को

    उसकी चप्पल की ऊँची एड़ियों को

    प्रयत्न करने लगता हूँ

    माँ की बातों के सच और

    पत्नी की एड़ियों में

    साम्य बैठाने का

    थक-थक कर चूर

    होता चला जाता हूँ मैं!

    स्रोत :
    • पुस्तक : दलित निर्वाचित कविताएँ (पृष्ठ 151)
    • संपादक : कँवल भारती
    • रचनाकार : विपिन बिहारी
    • प्रकाशन : इतिहासबोध प्रकाशन
    • संस्करण : 2006

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