आशंकित मन की निश्चिंतिता
ashankit man ki nishchintita
मैं आया हूँ अपनी आँखों की परिपाक बढ़ाने : चाहता हूँ कि गिरें
ये पके फल की तरह द्रष्टव्यों के पैर तले। आया हूँ कुछ न कहने
न थामने, केवल समझने उनको जो हर विषय में हैं सर्वज्ञ।
देखता हूँ उन ताश के ताज-पुरुषों को सिर हिलाते, ढूँढ़ता हूँ
उनके गिर्द घूमते साथियों को जो धुँधले गुच्छों में सहमति का
स्वादहीन सोमरस पेरते हैं, पनपाते हैं, ताकि वो और सर्वज्ञ लगे।
नशेपन में ही सच्चाई का सबसे क्रूर रूप उभरकर आता है, उसकी
विपत्तियाँ फैला देती हैं लोलुपता और संक्रामक व्याधियाँ।
आह, क्या कहना उनको जो सब जानते हैं, जो सर्वदा निश्चित हैं।
पूरा भवन, अपने सिंहद्वारों के साथ, अपनी चूनेदार दीवारों की विशालता लिए,
पिघल के गिर जाता है मेरी जीभ के सिरे पर
जब कहने को उद्धत होता हूँ,
मैं नहीं जानता।
- पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 203)
- संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
- संस्करण : 2006
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