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तर्क–वितर्क के बीचों-बीच तुम और मैं

tark–vitark ke bichon beech tum aur main

अवनीश यादव

अवनीश यादव

तर्क–वितर्क के बीचों-बीच तुम और मैं

अवनीश यादव

और अधिकअवनीश यादव

    अक्सर ही दिन के हलचल से ऊबता रहता हूँ

    रात के अकेलेपन से डर भी लगता है

    अक्सर भीड़ में जाते ही दब जाता हूँ

    और खाली जगह बैठते ही फिसलने लगता हूँ

    भटकना तो जैसे प्रवृत्ति बन चुकी है मेरी

    पहाड़ों से मुझें प्रेम नहीं होता है

    क्योंकि वो कठोर बने हुए है

    निष्ठुरता के साथ,

    नदियों से भी कुछ खास प्रभावित नहीं होता

    क्योंकि ये भी सुख जाती है वर्ष के ख़त्म होने से पहले ही,

    बादलों से भी कुछ खास चाहते नहीं है

    अक्सर ये भी छोड़ जाते हर बूँद को पृथ्वी पर,

    इतना तर्क-वितर्क करता हूँ

    फिर भी ऊबता नहीं हूँ

    बार-बार हर बार ही क़दम दो क़दम

    से बीत जाता हूँ

    पूरा का पूरा सच भी जान ही लेता हूँ

    फिर भी अक्सर लौट नहीं पाता हूँ,

    कुछ दो चार मनुष्य जो मेरे ही तर्कों से

    मुझे हरा देते है

    फिर भी मैं पीछे नहीं हटता, ना ही मेरे तर्क मुझें

    हटने देते है

    बार-बार हर बार मैं वापस लौटता हूँ

    तुम्हारे पास

    उसी तर्क को लेके जिसके बाद

    हम अलग हुए थे,

    तुम जो वापस लौट गई थी

    अपने तर्क को बिना सिद्ध किए ही

    अब फिर से तुम वही चले जाने का

    तर्क ढूँढ रही हो,

    हर बार ही तुम लौटती हो आधा

    मै जो चाहता हूँ तुम्हे पूरा का पूरा

    अपने ही तर्कों पर आधारित

    फिर तुम मिलती हो मुझें

    हर बार ही

    अधूरा का अधूरा॥

    स्रोत :
    • रचनाकार : अवनीश यादव
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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