मैं जब भी जाता हूँ रामकोला
main jab bhi jata hoon ramkola
मैं जब भी जाता हूँ रामकोला
साँसो के साथ-साथ बढ़ने लगती है मेरे धड़कन की गति
ज्यों-ज्यों आता है पास स्टेशन
आने लगती है वहाँ कि मिटटी की सुगंध
आसमान का रंग बदलने लगता है
बदलने लगती है मेरे रूह की ऋतुएँ
स्टेशन के पीछे से निकलती हुई
किसानों के पसीने की गंध
इक अजब एहसासत-सी लगती है
खेतों से गुज़रते हुए
मेड़ों पर चलते हुए
याद आता है बचपन
बचपन
जहाँ आकाश हमारी मुट्ठी में क़ैद था
उँगलियों पर गिन लेते थे चाँद-सितारों को
जुगनुओं संग खेलते थे लुका-छिपी का खेल
तितलियों-सा उड़ते थे स्वच्छंद आकाश में
मैं जब भी जाता हूँ रामकोला
डामर से बने सड़क पर चलते हुए याद आता है चकरोट
चकरोट
एक ऐसा रस्ता
जो सपनों से निकाल कर ले जाता था मंज़िल की ओर
मंज़िल जो बदल देती है जीवन की परिभाषा
मैं जब भी जाता हूँ रामकोला
आसमान के आयतन को नापते
उन्मुक्त उड़ान भरते
दिखने लगते है पखेरुओं के बच्चे
उनकी चहचाहट से चहक उठता है मन
खिल उठता है चारों ओर सरसों-सा
- रचनाकार : नूर आलम नूर
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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