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विरोधभास

virodhbhas

आरसी प्रसाद सिंह

और अधिकआरसी प्रसाद सिंह

    एहि जगतमे कुसुम-कुंज जँ,

    तँ कंटक-संकट किछु कम ने!

    अनायास सौभाग्य सुलभ जँ

    तँ समुचित उपभोग सुगम ने!

    पुण्यवानकेँ दुखिया देखल,

    पापी जनकेँ पाओल सुखिया!

    गुणी व्यक्ति रहि जाथि उपेक्षित,

    तिकड़मबाज बनल अछि मुखिया!

    धूर्त्त-शिरोमणि सत्ताधारी,

    त्यागक पाठ पढ़इ छथि ज्ञानी!

    मूर्खक घरमे लक्ष्मी बइसलि,

    पण्डित-प्रवर दरिद्र, अमानी!

    कतहु चैन ने पाबइ छै नर,

    आशा-तृष्णा-शरसँ वेधल!

    एक फांस सँ जखनहि छूटल,

    दोसरमे तखने उद्बेगल!

    बान्हि आँखिपर पट्टी कोल्हुक

    बरद-जकाँ सदिखन घूमय!

    उड़ि-उड़ि विवश जहाजक पंछी

    फेर जहाजे पर जा जूमय!

    जीवन परवशताक नाम की?

    तखन मिलब आनन्द असम्भव!

    सुख-साधन मिलि जाय कदाचित,

    फुलत ने शांति-कल्पतरु-पल्लव!

    साधूकेँ प्रपंच ने भावय,

    बढ़ल प्रपंची रंगमंचपर!

    शांति-उपासक रहथु घरेमे,

    चालू पुर्जा चढ़ल पंचपर!

    देव रहथु बैसल मुँह बौने,

    दनुज टीपि लऽ गेल अमृत-घट!

    वैरागी वैराग-मगन जँ

    अनुरागीपर सबटा संकट!

    माया-मिथ्या जगत् एक ले,

    दोसर ले सब किछु लौकिक थिक!

    सपना थिक जँ एक दृष्टिमे,

    दोसरमे पूरा भौतिक थिक!

    नहि कोनो सीमा-रेखा छै?

    नहि छै संधि-विन्दु की ओकर?

    निराकार-साकारक संगम?

    नहि की मिलन अगोचर गोचर?

    जीअब भेल असंभव सज्जन

    ले, जे सब किछु सहन करइ ऐ!

    किन्तु, सरल सन्मार्ग छोड़ि कऽ

    जे असत्य ने ग्रहण करइ ऐ!

    वरण करइए स्वयं अभावक

    पूजा, कष्ट-विपत्ति सहइए!

    मानवता-कल्याण हेतु

    तइयो निशिदिन विकल रहइए!

    जे सत्यक प्रकाशमे रहि कऽ

    जीवन, स्वास्थ्य करइ अनुभव छथि!

    परम अकिंचनतोमे अतुलित

    संसारक पाबइ वैभव छथि!

    स्रोत :
    • पुस्तक : सूर्यमुखी (पृष्ठ 73)
    • रचनाकार : आरसी प्रसाद सिंह
    • प्रकाशन : मैथिली अकादमी, पटना
    • संस्करण : 2011

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