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परिपाटी

paripati

आरसी प्रसाद सिंह

और अधिकआरसी प्रसाद सिंह

    (1)

    की परसै छी? फूसि लगा कऽ,

    कनिये तखन परसियौ, बाबू!

    देखि भरल भण्डार उठय भऽ

    मोनने आहौंक कतउ बेकाबू।

    सूरदास बुझतै घी तखने,

    जखन पातपर गड़गड़ करतै!

    बाड़िक पटुआ तीत, मुदा

    बेनाक सागपर के ने मरतै।

    (2)

    एक झूठकेँ बचबऽ ले

    मीनार उठाबऽ झूठक पड़लै।

    मुदा, बिहाड़ि एकटा साँचक

    अयलै, माघक मेघ उखड़लै।

    बालुक महल बना कऽ सुन्नर

    चमत्कार क्यो किए ने कहतै?

    पानिक एक लहरिमे ओकर

    नाम-निसान ने कोनो रहतै।

    (3)

    साँचक लक्षण यैह असल थिक,

    बेर हजारो किए ने बाजी।

    अनवधान रहितहुँ, प्रसंग

    होइ कथान्तरपर ने राजी।

    मुदा, फूसि ले सदा अपेक्षित

    बहुत सावधानी-सतर्कता।

    बाजब जतबा बेर, कथ्यमे

    हेर-फेर, सम्भाव्य-कुटिलता!

    (4)

    गूड़क मारि जनै छै धोकरे,

    फूसिक की व्यापार चलै छै?

    जनितो झूठक व्यवहारेँ

    मनु-लोकक संसार चलै छै।

    'सत्यमेव जयते'क कऽ घोषणा

    सत्ययुगक पौराणिक जानू।

    एहि अगम कलिकालक अछि

    प्रत्यक्ष धर्म से झूठे मानू।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सूर्यमुखी (पृष्ठ 106)
    • रचनाकार : आरसी प्रसाद सिंह
    • प्रकाशन : मैथिली अकादमी, पटना
    • संस्करण : 2011

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