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वर्तमान भारतीय

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सुब्रह्मण्य भारती

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सुब्रह्मण्य भारती

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    देख आज के जन की हालत, हृदय फटा जाता है।

    भय के कारण दुनियाँ में जीते—जो मरा करेंगे।

    कोई ऐसी वस्तु नहीं जो देखे नहीं डरेंगे।

    उनके दिन दंभ, प्रतिकार, कपट के दैत्य खड़े हैं।

    इस तरुवर, उस तरुवर, उस खंडहर में छिपे पड़े हैं॥

    यही सोच करके मानव अब क्लांत हुआ जाता है।

    देख आज के जन की हालत, हृदय फटा जाता है॥1॥

    तांत्रिक का तो नाम मात्र सुनकर घबरा जाएँगे।

    'ओझा' और 'मदारी', 'जादूगर' सुन थर्राएँगे।

    शक्ति हमारी ले हम पर ही शासन जो करते हैं।

    मानव ऐसे राजनीतिज्ञों से भी अब डरते हैं।

    उनको भूत समझकर जिनका ख़ून सूख जाता है।

    देख आज के जन की हालत, हृदय फटा जाता है॥2॥

    देख सिपाही, चौकीदार, दिल धड़क-धड़क जाएँगे।

    कोई ले बंदूक चले तो घर में छिप जाएँगे।

    देखें यदि अति दूर सुसज्जित किसी व्यक्ति को आते।

    भय के मारे हाथ जोड़कर स्वयं खड़े हो जाते।

    सबके आगे भीगी बिल्ली बन जाया करता है।

    देख आज के जन की हालत, हृदय फटा जाता है॥3॥

    फटता हृदय कहूँ क्या, हमें कितने भेद यहीं हैं।

    एक कोटि यदि कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति नहीं है।

    पुत्र अगर कहता है, है नागेश पाँच सिर वाला।

    और पिता कह दे छः सिर, भारी अंतर कर डाला।

    इतने अंतर से ही उनमें वैर बढ़ा जाता है।

    देख आज के जन की हालत, हृदय फटा जाता है॥4॥

    शास्त्र पढ़, दंभी शास्त्री पिशाच का मत मानेंगे।

    अंतर पड़ने पर स्वगोत्र को गाली दे डालेंगे।

    छली, प्रपंची कपट की वे सेवा तक करते हैं।

    मुक्त कंठ से करें प्रशंसा और नमन करते हैं।

    व्यक्ति-व्यक्ति वह शैव, अमुक वैष्णव कहता लड़ता है।

    देख आज के जन की हालत, हृदय फटा जाता है॥5॥

    हृदय फटा जाता है पर मैं घृणा नहीं कर पाता।

    हाय! अभागों को अन्न, भर पेट कभी मिल पाता।

    ये कारण जानने के लिए यत्न नहीं करते हैं।

    जहाँ देखिए है अकाल, सब तड़प-तड़प मरते हैं।

    उनके कष्ट-हरण का पथ ही दृष्टि नहीं आता है।

    देख आज के जन की हालत हृदय फटा जाता है॥6॥

    शक्ति नहीं चलने की, ग्रस्त सदा रहते रोगों से।

    पर वे दिखाए पथ पर चलते शिशु-से, अंधों-से।

    चार हज़ार करोड़ से अधिक रंग-बिरंगी मधुर कलाएँ—

    जनमीं जिस भारतभू पर, जिन पर सब जग में गर्व मनाएँ।

    उसमें व्यक्ति विवेकहीन पशु-सा जीवन जीता है।

    देख आज के जन की हालत, हृदय फटा जाता है॥6॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : राष्ट्रीय कविताएँ एवं पांचाली शपथम् (पृष्ठ 58)
    • रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक एन. सुंदरम् और विश्वनाथ सिंह 'विश्वासी'
    • प्रकाशन : ग्रंथ सदन प्रकाशन
    • संस्करण : 2007

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