कॉमनवेल्थ शॉर्ट स्टोरी विजेता कहानी पर AI की परछाईं!
मयंक जैन परिच्छा
21 मई 2026
कॉमनवेल्थ शॉर्ट स्टोरी प्राइज़, 2026 की कैरेबियाई क्षेत्रीय विजेता कहानी, ‘द सर्पेंट इन द ग्रोव’ (उपवन में सर्प) चर्चा में है। चर्चा का कारण है, आरोप : कहानी का आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) के प्रयोग से लिखे होने का। कॉमनवेल्थ फ़ाउंडेशन आरोपों की जाँच कर रही है, फ़िलहाल अभी यह कहानी ‘ग्रांटा’ की वेबसाइट पर मौजूद है। इस कहानी के लेखक कैरिबियाई मूल के 61 वर्षीय जमीर नज़ीर ने यह लेख के लिखे जाने तक, कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है।
‘द सर्पेंट इन द ग्रोव’ एक किसान की कहानी है जो ‘किसी दूसरी स्त्री के प्रति आकर्षण में डूबा हुआ है, वह स्त्री उसकी पत्नी नहीं है।’ इस कहानी को इसके रूपकों और गद्य व पद्य के ‘सुंदर’ प्रयोग के लिए सराहा गया।
कहानी में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) के प्रयोग की बात ने पूरे साहित्यिक हलक़ों में हलचल मचा दी है, क्योंकि यह कई सवाल खड़े करता है।
पहला : कैसे एक कहानी, AI के उपयोग के बाद भी इतने प्रतिष्ठित पुरस्कार में जीत की दहलीज़ तक पहुँची? क्या संपादक मंडल को ज़रा भी संदेह नहीं हुआ? कई लोगों का मानना है कि इन पुरस्कारों की औपनिवेशिक प्रवृत्ति—जो एक ख़ास क़िस्म के ढाँचे या लेखन-शैली को खोजती है, AI लिखित कहानियाँ, या AI से सजाई गईं कहानियाँ, उस खोज को पूरा कर सकती हैं।
यह काफ़ी अस्पष्ट दलील है। हालाँकि AI पूर्वाग्रहों से भरा है, फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि औपनिवेशिक समाज से आईं, AI जनित कहानियाँ औपनिवेशिक समाज को पसंद आएँगी। कुछ लोगों का तो यह भी मानना है कि यह विवाद ही फ़ालतू है, क्योंकि सात हज़ार से अधिक एंट्रियाँ, बिना मशीनी सहायता कैसे पढ़ी जा सकती हैं! एक और बात कि जमीर नज़ीर की कहानी में ‘द गर्ल स्माइल्ड लाइक सनराइज़ ओवर ए सिंक’ जैसे बेतुके रूपक का उपयोग है, जिसको संपादकों को समझना चाहिए था। लेकिन इससे इतर मुख्य बात है कि क्या हमारे पास पर्याप्त उपकरण हैं कि हम AI की जाँच कर पाएँ? इंटरनेट पर मौजूद फ़्री AI टूल्स में, अगर कोई ख़ुद के द्वारा लिखित पैराग्राफ़ डालता है, तो वह भी कई बार AI जनित बता दिया जाता है। यह इन उपकरणों की विश्वसनीयता का सवाल भी है।
वैसे किसी की भाषा में एक ढाँचा है तो वह AI जनित लग सकता है तो यह एक चिंता का विषय भी बन जाता है? ऐसे में बहुत अच्छे से लिखे सुंदर वाक्यों या आख्यानों पर संदेह होता है।
AI का उपयोग हम सब कर रहे हैं और इसका उपयोग बहुतायत रूप से बढ़ेगा ही। तो क्या हम AI को अपनी भाषा में आने से रोक पाएँगे? मसलन, अँग्रेज़ी में ‘डेल्व’ जैसे शब्द, ‘डीप’ जैसे विशेषण और नकारात्मक समानांतरता (मतलब ये अ नहीं ब है), एम डैश का उपयोग आदि किसी भी लिखे का AI जनित होना दर्शा सकता है। लेखक ऐसे बातों का ध्यान रख सकते हैं, रखते भी हैं।
तो क्या संपादकों को बुनियादी समझ नहीं होनी चाहिए? कैसे इतने बड़े पुरस्कार के संपादक धोखे का शिकार हो जा रहे हैं? (ख़ैर, अभी उस कहानी की AI जनित होने की पुष्टि नहीं हुई है।) लेकिन हमको AI के पैरानोइआ से बचना होगा।
काफ़ी ख़बरें आती हैं कि लोग जानबूझकर अपने लिखे में ग़लतियाँ छोड़ रहे हैं, ताकि उनके संपादक उन्हें AI से लिखा हुआ न ठहराए। एक लेखक के लिए यह माना जाना कि उसका लिखे में AI प्रयोग हुआ है, बहुत बड़ा आरोप है। जैसे, हाल ही में पोलैंड की लेखक, 2018 की नोबेल पुरस्कार विजेता ओल्गा तोकार्चुक ने एक साक्षात्कार में यह कह दिया कि उन्होंने अपने शोध के लिए AI का प्रयोग किया है, तो यह बात इतने बड़े चर्चा का विषय हो गई कि उन्हें सफ़ाई देते हुए कहना पड़ा, “मेरे किसी भी लेखन, यहाँ तक कि वह उपन्यास भी जो इस पतझड़ (फ़ॉल) में पोलिश भाषा में प्रकाशित होगा, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से नहीं लिखा गया है—सिवाय इसके कि शुरुआती शोध को तेज़ करने के लिए उसे एक औज़ार की तरह इस्तेमाल किया गया हो।”
शोध के लिए AI का प्रयोग करना ग़लत है? अगर है तो, एक लेखक के तौर पर काफ़ी लेखक इसका प्रयोग करना बंद कर सकते हैं। लेकिन आगे की पीढ़ी को कैसे रोकेंगे? AI साहित्य में आएगा ही, हम इसको आज स्वीकारें या कल। इसके लिए हमें मानक बनाने होंगे।
हाल ही में अशोका यूनिवर्सिटी ने मलयालम साहित्य के AI-एसिटेट अनुवाद के लिए एक फ़ेलोशिप निकाली; अब क्योंकि लोग प्रयोग कर रहे हैं तो हम आँख नहीं बंद कर सकते। यह एक समझदार निर्णय है। अगर एक बच्चे के नज़रिये से सोचा जाए तो आज स्कूल, कॉलेज हर जगह AI का उपयोग बढ़ रहा है, अगर वह बच्चा आगे साहित्यकार बनता है या लेखन करता है तो क्या उसकी भाषा में आर्टिफ़िशियल भाषा के तत्त्व नहीं होंगे? हो सकता है कि वह जानबूझकर उन तत्त्वों का उपयोग न करे; लेकिन काफ़ी संभावना है कि उसकी भाषा में AI के कुछ पैटर्न हो सकते हैं, क्योंकि वह उसी तरह की भाषा को सुनते-लिखते-पढ़ते यहाँ तक पहुँचा है।
हम AI से दूर नहीं रह सकते, न ही नकार सकते। जब हम अपने शोध के लिए या किसी भी कार्य के लिए, AI टेक्स्ट पढ़ेंगे तो ये पैटर्न या भाषाई संरचना हमारे वाक्यों में भी आ सकती है। हम जिस प्रकार किसी भी अच्छे लेखक को पढ़ते हैं, उसकी भाषा हमारी भाषा में आ जाती है; उदाहरण के तौर पर वी. एस. नायपॉल को लोग इसलिए भी पढ़ते हैं, ताकि उनकी भाषा से सीखा जा सके।
या फिर हम जानबूझकर इन AI पैटर्न से बचें, जोकि काफ़ी लेखक करते हैं और करना भी चाहिए।
एक और सवाल है कि कई लोग जो अपनी कहानियों को संपादित करने या प्रतिक्रिया लेने के लिए AI का प्रयोग करते हैं। तो क्या यह भी ग़लत है? एक अच्छे संपादक की अनुपस्थिति में अगर कोई अपने लेख को AI से संपादित करवा रहा है तो इसको नैतिकता के स्तर पर ग़लत माना जाना चाहिए? और नहीं माना जाना चाहिए, तो कहाँ तक? क्या इस तरीक़े से संपादित लेख या कहानी AI जनित मानी जाएगी?
हमको ऐसे सभी सवालों के जवाब ढूँढ़ने होंगे। लेखक इन सवालों से बच नहीं सकते। घोषणा करना एक तरीक़ा है, जैसे हाल ही में प्रकाशित कई किताबों में AI जनित हिस्सों को घोषित किया गया जो बहुत सराहनीय है। लेकिन सब घोषित नहीं करेंगे, क्योंकि AI लेखक होने का आरोप किसी को भी डरा सकता है और यह बहुत पीड़ादायक आरोप हो सकता है। फिर भी इसके लिए कोई न कोई मानक रखने ही होंगे।
काफ़ी लेखक मानते हैं कि AI हमेशा मीडियाकर कहानी या लेख ही लिख सकता है, वह कभी भी मानव लेखक को रिप्लेस नहीं कर पाएगा। मेरा मानना भी यही है, AI से लिखा इंसान के लिखे से बेहतर नहीं हो सकता। जमीर नज़ीर की कहानी (AI से लिखी गई हो या न लिखी गई हो) मुझे विजेता योग्य एंट्री नहीं लगी।
फिर भी हमारे समक्ष जटिल सवाल हैं, जिनके उत्तर हमको देने होंगे। बड़े प्रकाशक (पेंगुइन इत्यादि), विश्वविद्यालय इसके बारे में सोच रहे हैं और AI के उपयोग को समझ रहे हैं, लेकिन लेखक समुदाय को इस पर एक समझ बनानी होगी और ज़रूरी मानक तय करने होंगे। मैं AI को अभी तक साहित्य के लिए इतना बड़ा ख़तरा नहीं मानता। भविष्य में विचार बदल जाएँ तो पता नहीं।
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