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पत्थर

patthar

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

मरीन फ्रनीचेविच

और अधिकमरीन फ्रनीचेविच

    समय के अंक में रचा गया क्षेत्र

    और वास्तविक पत्थर सड़क के किनारे।

    वृक्षों और ऊँची नीरवता के बीच अकेला ही।

    डरता नहीं जो अचलता से दंशों से।

    वासना है उसकी गत वर्ष की बरखा की

    गंध में, निर्जन दुपहरियों की नीलाई में।

    जीवन पत्थर तीक्ष्ण चट्टान में।

    बूँद जमते हुए विचारों की आँख में बड़े ढेर की

    जिसे मिल गया आकार अपना। सिर के पीछे छाया।

    और पत्थर अकेला चट्टान की अंतिम रेख पर।

    बकवाद और अँधेरे और विकट सर्दियों के बीच।

    अस्तित्व के उद्यान में। उस भोर के खेल में जो स्वयं

    मूक, ऊषाकाल में जब कोई नहीं सह सकता

    को ही निगल रहा।

    एकांत। दर्द है उसका आकार के अनुरूप। जलता हुआ संकेत।

    और अवसाद भरी कहानी उस सबकी जो घटा नहीं।

    क्योंकि पत्थर ही रहा आया।

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 97)
    • संपादक : श्यौराजसिंह जैन
    • रचनाकार : मरीन फ्रनीचेविच
    • प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

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