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सॉनेट

saunet

सॉनेट देख त्रिलोचन के आँतर में हमरा

सोता फूटल, मन अगराइल देखीं कइसन

चौकस रहलीं भटक पावल कतहीं लमरा

मन बउराइल बेलगाम घोड़ा के अइसन।

अगल-बगल देखलीं हम, जवन ऊहे लिखलीं

आखर-आखर में गवलीं जन-जन के बाथा

कइसे जीयल जाला हम लोगिन से सिखलीं

ईहे बाटे हमरा जीवन के बस गाथा।

हार-थाक के बइठल बाड़े लोग लुंकाइल

सहमल-सहमल चुप्पी सधले ताक रहल बा

चेहरा बा सूखल, आँखिन के लोर सुखाइल

अलग-अलग मन जइसे पत्ता ढाक रहल बा

साइत रउरा मन के इचिको ना भावे

ठकुर सोहाती साँच कहीं ना हमरा भावे।

स्रोत :
  • पुस्तक : आपन गाँव भेंटाते नइखे (पृष्ठ 25)
  • रचनाकार : कृष्णानन्द कृष्ण
  • प्रकाशन : पुनः प्रकाशन, पटना
  • संस्करण : 2012

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