Font by Mehr Nastaliq Web

भय

bhay

अनीता वर्मा

अन्य

अन्य

और अधिकअनीता वर्मा

    भय एक आकार है

    चाँदनी रात में एक सूना पेड़

    जो एक तंबू की तरह तना हुआ है स्त्रियों के ऊपर

    बचपन से गृहस्थी तक उनका भय बड़ा होता रहता है।

    उनके साथ-साथ

    शरीर और आत्मा को बचाने की कला

    वे शुरू से सीखती आई हैं

    भीड़ में कुहनियों को अपनी ढाल बनाए

    दफ़्तरों में सख़्त चेहरे लिए

    वे अपने भय की रखवाली करती हैं

    उनके प्रेम में भी भर दिया गया है भय

    और तुम जहाँ उन्हें निर्भय देखते हो

    जहाँ वे बेखटके चली आती हैं झुंड की झुंड

    वहाँ भी उन्होंने भय के ही बनाए हैं हथियार

    उनकी सज्जा भी एक भय है

    जो कपड़ों की तह में अँधेरे की तरह बैठा है

    खुले केशों की तरह रेशे-रेशे दिखता है

    हँसी को भी अपना भय छिपाने की जगह बना लेती हैं स्त्रियाँ

    जहाँ वे इस दुनिया से इनकार करती हैं

    उनका रोना कभी किसी ने देखा-सुना नहीं

    उनके नाख़ून ख़ूबसूरती से तराश दिए गए हैं

    जिन पर मीठी पॉलिश चढ़ी है

    कँटीली आँखों में उपेक्षा जैसा कुछ है

    जिसे घायल करने के क़सीदे में बदल दिया गया है

    जब वे अपना सब कुछ दे डालती हैं

    और कोई उम्मीद नहीं रखतीं

    तब भी उन्हें अपने भ्रम का पता नहीं होता

    वे विरोध नहीं करतीं चुनौती नहीं देतीं

    उन्हें याद है सिर के टुकड़ों में बिखरने की पुरानी चेतावनी

    वे शायद अपने आपसे पूछती हैं

    क्यों उनकी आत्मा कभी साँस नहीं लेती

    चिड़ियों की तरह पंख नहीं फैलाती

    उनके समुद्र में क्यों सिर्फ़ नमक है

    चाँदनी रात उनके लिए भी सुंदर हो सकती थी

    लेकिन उसमें अक्सर एक काला पेड़ उगा रहता है

    और एक क्रूर हँसी उन्हें दूर तक गूँजती सुनाई देती है

    स्रोत :
    • पुस्तक : रोशनी के रास्ते पर (पृष्ठ 19)
    • रचनाकार : अनीता वर्मा
    • प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन
    • संस्करण : 2008

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY