गुम बच्चे की याद

प्रभात

गुम बच्चे की याद

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    मेरी ग़रीब चचेरी बहन

    शादी भी जिसकी ठीक से की नहीं जा सकी

    बस भेज दी गई

    कुछ औरतों के गाए गीतों के साथ हुई उसकी विदाई

    दो-एक ही साल बाद विवाह के गीतों के शब्द निष्प्रभ हो गए

    उनकी ध्वनियों की चिड़ियाएँ सदा के लिए सो गईं

    उसके पति ने एक हत्यारे की हत्या कर दी

    वह भारत की जेलों के उन लाखों अभिशप्त क़ैदियों के बीच जा बैठा

    जिनकी ज़मानत नहीं होती

    टलती जाती है जिनकी सुनवाई

    ससुराल में वह रहने नहीं दी गई

    गोद के बच्चे के साथ वह लाचार गई यहीं

    उसे रहने के लिए एक घै पाटोर बता दी गई

    हल्ला-मजूरी करके अपना और बच्चे का पेट पालने लगी

    ऐसी मेरी ग़रीब चचेरी बहन का बच्चा था वो

    सात साल का हो गया था

    बड़ी उम्मीद से बड़ा कर रही थी उसको

    पढ़ने भेज रही थी

    स्कूल नाम के सरकारी बाड़े में रोज़ बैठता था जाकर

    बच्चों के साथ खेलता था स्कूल से आकर

    उस खेलते हुए को

    मुर्ग़ी के चूजे की तरह ग़ायब कर ले गया कोई

    लिखने में भी तकलीफ़ होती है कि पुलिस, सरपंच, विधायक, देवी-देवता

    सबके दरवाज़ों पर ढोक दे चुकी है

    सबके पैरों में सिर पटक चुकी है

    अब तो यही सोचने-बिचारने को रह गया है

    आख़िर कौन था वह जो ले गया खेलते बच्चे को

    क्या वह ख़ुद दरिद्रता, भूख और कुशिक्षा का शिकार था कोई

    क्या उसने कहीं सुनसान में ले जाकर बलि या क़ुर्बानी दे दी बच्चे की

    या उसने खाए-पिए-अघाए सभ्य-बर्बरों को बेच दिया उसे

    क्या उसे अरब भेज दिया ऊँट पर बाँधकर मारे जाने के लिए

    क्या किसी आधुनिक साधु या पर्यटक को बेच आया वह उसे

    क्या किसी मेज़ पर तश्तरी में रखा गया उसे

    इतने बच्चे ग़ायब होते हैं हर साल

    लेकिन बिजली-पानी की माँग जैसा छोटा-मोटा मुद्दा भी नहीं बनती यह बात

    तीन महीने भी याद नहीं रखा गया एक बच्चे का ग़ायब होना

    सूखे पेड़ के सूखे फूल-पत्तों में बदल गई है

    इंसानी समाज और सभ्यता की हरी-भरी संवेदना

    जिस दिन से गुम हुआ है बच्चा

    मेरी चचेरी बहन भी गुम है

    वह नहीं जानती कि मरे जीवित

    बच्चे के साथ कैसे जीना चाहिए

    इसी दुनिया में कहीं

    और कहीं भी नहीं बच्चे की सुध कैसे रखनी चाहिए

    कैसे उसे सुलाना चाहिए

    कैसे उसे जगाना चाहिए

    कैसे उसे समझाना चाहिए अपना ध्यान रखने के लिए

    लापरवाही करने पर कैसे सख़्त हिदायत दी जानी चाहिए

    अगर उसके अंगों को खोलकर

    अलग-अलग शरीरों में नहीं लगा दिया गया है

    अगर स्त्री-लोथों से ऊबे विकृतों ने उसे रिहा कर दिया है

    अगर दासों की तरह उसके पुट्ठों पर थाप दे-देकर

    उसे कई बार बेच और ख़रीद लिया गया है

    तो अब वह कहाँ और क्या कर रहा है

    कैसा दिखने लगा है वह हाड़-मांस पुतला सालों बाद

    क्या वह ब्रेड पर आयोडेक्स लगाकर खा चुका है

    क्या दुनिया की सभी लड़कियों के लिए डरावना हो चुका है

    क्या वह किसी महानगर की बत्ती गुल करने निकल पड़ा है

    क्या वह टेलीफ़ोन लाइन काटने गया है

    क्या वह किसी भीड़ भरे इलाक़े में बम रख रहा है

    क्या वह रस्सों से बँधा है

    क्या वह अपना फटा-टूटा शरीर लिए न्यायालय में उपस्थित है

    क्या उसे जेल में ही फाँसी दे दी गई है

    क्या उसे वहीं मिट्टी में मिट्टी, राख में राख कर दिया गया है

    मेरी चचेरी बहन

    दो पीढ़ी पीछे जाएँ तो

    हम एक ही दम्पति की संतान हैं

    एकाध पीढ़ी और पीछे जाएँ तो

    पूरा क़बीला ही एक दम्पति की संतान है

    अंततः जैसे दुनिया ही एक दम्पति की संतान हैं

    इस तरह देखो तो

    कोई भी दूर का नहीं है

    कोई भी पराया नहीं है

    सभी अपने हैं कोई भी शत्रु नहीं है

    वास्तव में देखो तो कैसे-कैसे शत्रु हैं चारों तरफ़

    मेरी चचेरी बहन

    उसके कपड़े जिनमें से झाँकते हैं उसके धूल के बने हाथ-पैर

    उसके फूस के केश झाँकते हैं

    गोली खाई हिरनी की करुण सजल आँखें झाँकती हैं

    मैं पूछता हूँ कभी-कभी उससे

    जीजी तुम्हें इस ब्रह्मांड की किस हाट पर मिलते हैं इतने फीके

    इतना अधिक रंग उड़े कपड़े

    क्या तुम आकाशगंगा से लाती हो इन्हें

    पागल है तू

    कहकर हँस देती है जीवन की धनी मेरी चचेरी बहन

    स्रोत :
    • रचनाकार : प्रभात
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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