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परभाती हँसि पलास के बन का धीरे-धीरे

लाली-लाली अँगुरिन ते गुदगुदी छुटयि जगायि रही।

बिन पातिन के छिपुलन पर टेसू फूले झूलयिं,

का परलयि की फउजयि हाँथन पर अंगार नचायि रहीं?

यी सोने की ब्यरिया मा अँटकति, नाचति, उछरति

चरवाहन की टोली का अगुआ वुहु सुन्दर साँवलिया—

चरवाहु चला बंसीवाला।

गाढ़ा की चुस्त मिरजई, तिहि पर फ्याँटा बँसुड़ी,

कानन बारी, मूड़ मुड़इठा, काँधे झब्बा झूलि रहा।

पहुँचारी पहिंदे हाथे लीन्हें धनुही-तरकसु,

दगर-दगर माथे ऊपर तिरपुण्डु किहे इँटक्वहरा का।

र्याख उठन्ता ज्वानु र्वाब देंही ते बरसइ

खोंडस बर्स किसोर राम का निरछल रूपु मनोहर वुहु—

चरवाहु चला बंसीबाला।

काँकर की कुरसी-मेज जोरि इजलासु बनावयिं—

लरिका करयिं मुकदिमा बाजी कस सरपंच सोहायि रहा!

हँसि-हँसि कय लिखयि बयानु, देयि पातिन के पुरजा,

सजा बोलि कयि कैदु करयि, वुहिका सब हुकुम बजायि रहे,

जब सँड़वा डहँकयि, तित्तुर बहँसयिं होयि लराई,

झूँठ-मूठु का राजा वुहु साँचउ राजा अस चितयि-चितयि—

चरवाहु चलयि बंसीवाला।

जब ठीक दुपहरी खिली, बड़े मुखिया की बिटिया—

आयी चाउर-दूध पूजि जंगली-नाथ सिउ-संकर का।

छ्वटकये लरिकवा गाँसि चिढ़ावयिं काकी! भउजी!

वह पियारु कयि लेयि देखि, चरवाहु हँसयि हिरदउँ खोले।

ज्याठ की पुरनमासी, मङ्गरु, रोहिनी नखत पर

यहयि रूप की रासि चलयि दुलहिनि बनि कयि आगेपाछे—

चरवाहु चलयि बंसीवाला।

जंगल के बीच तलाउ, किनारे गोरू छिटके,

आँबु अक्यलवा ऊपर बउरा क्वयिली टुटू-टुहू ब्वालयिं।

बन फल सब बीनि-बटोरि लरिकवा लयि-लयि आँवयिं

चीखि-चीखि दादा का दयि-दयि, भउजी ते ठलुहायि करयिं—

सब नंगी देही पर पियार का जामा पहिंदे

कँगलन बीच प्रेम-माया की अगनित गठरी बाँधि-बाँधि।

चरवाहु चला बंसीवाला।

गउहाने तर खजूरि ऊपर जब चढ़यि चँदरमा,

रहस-मंडली मचयि मजे मा, खपटन के तबला बाजयिं—

लरिकवा घेरि दादा भउजी दूनऊ का पकरायिं,

क्यसन कँधय्या यहयि नीक जब राधा-रानी तुहें बनयिं।

दूनउँ-दूनउँ का देखि याक क्वँडरा मा नाचयिं

सबके सुखते सुखी भ्वरहरे लीला पूरी होतयि खन—

चरवाहु चला बंसीवाला।

स्रोत :
  • पुस्तक : पढ़ीस ग्रंथावली (पृष्ठ 91)
  • संपादक : डॉ. रामविलास शर्मा, युक्तिभद्र दीक्षित
  • रचनाकार : बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
  • प्रकाशन : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
  • संस्करण : 1998

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