सुनील दत्त की मानवीय विरासत
इश्तिआक़ अहमद
25 मई 2026
20 अक्तूबर 2001 को दत्त साहब (सुनील दत्त) से उनके ऑफ़िस में मिलने का मौक़ा मिला। शुरुआत में हमारी मुलाक़ात का वक़्त केवल 20 मिनट तय हुआ था, लेकिन जब उन्हें पता चला कि मैं पश्चिमी पंजाब से आया हूँ, तो हमारी मुलाक़ात लगभग ढाई घंटे तक चली। मेरा विचार था कि 1947 के बँटवारे के पीड़ित हिंदुओं, मुस्लिमों, सिखों के लिए वाघा-अटारी बॉर्डर पर नो-मेंस लैंड में एक स्मारक बनाया जाए, जिसके लिए मैं उनका समर्थन चाहता था। वह इसे सुनकर बहुत ख़ुश हुए और उन्होंने मेरी जितनी हो सके, उतनी मदद करने का वादा किया।
1947 में पंजाब के बँटवारे के बारे में मेरे मन में कई सवाल थे। उनमें से एक था कि ये हुसैनी ब्राह्मण कौन होते हैं, जो इस्लाम और हिंदू धर्म के समन्वय का एक अद्भुत उदाहरण थे। सुनील दत्त उसी समुदाय के थे और उन्होंने मुझे उस समुदाय के इतिहास की कहानी बताई, जिसके अनुसार उनके पूर्वज अरब में बस गए थे और उनके पूर्वजों में से एक रहाब सिद्ध दत्त और उनके बेटों ने 680 ईस्वी में कर्बला की लड़ाई में इमाम हुसैन (रज़ि.) की तरफ़ से लड़ाई लड़ी थी। वे इमाम और उनके अन्य साथियों के साथ लड़ते हुए मारे गए। उनके परिवार के कुछ सदस्य बच गए और पंजाब लौट आए।
रहाब दत्त के बारे में सच जो भी हो, लेकिन बँटवारे से पहले के पंजाब में उनकी दोनों धर्मों वाली पहचान से जुड़े छंद गाए जाते थे, उनमें से एक इस तरह था :
वाह दत्त सुल्तान,
हिंदू का धर्म
मुसलमान का ईमान,
आधा हिंदी आधा मुसलमान
दत्त साहब का जन्म 6 जून 1929 को पश्चिमी पंजाब के खुर्द नामक गाँव में हुआ था, जो झेलम शहर से क़रीब 20 किलोमीटर दूर है। पश्चिमी पंजाब से आए एक शरणार्थी के लिए जीवन वाक़ई बहुत कठिन था। उन्हें पहली बार 1955 में फ़िल्मों में ब्रेक मिला और महबूब ख़ान की क्लासिक फ़िल्म ‘मदर इंडिया’ (1957) से मशहूर हुए। उनके दूसरे सह-कलाकार राजेंद्र कुमार (सियालकोट से) थे और दोनों ने मशहूर ‘मदर इंडिया’ में नायिका नरगिस के बेटों की भूमिका निभाई थी। नरगिस इस फ़िल्म में ग़रीबी और साहूकार के उत्पीड़न से जूझती हुई एक किसान महिला की भूमिका निभाती हैं। इस फ़िल्म की शूटिंग के दौरान सेट पर आग लगने से नरगिस आग की लपटों में घिर गई थीं और सुनील दत्त ने अपनी जान पर खेलकर उनकी जान बचाई थी। उस समय नरगिस-राज कपूर का रोमांस मशहूर था। पर यह रिश्ता जल्दी ही ख़त्म हो गया और नरगिस ने सुनील दत्त से शादी कर ली।
बाद में उन्होंने कई मशहूर फ़िल्मों में काम किया और कुछ फ़िल्मों का प्रोडक्शन और डायरेक्शन भी किया। इनमें ‘सुजाता’ (1959) उनके अपने प्रोडक्शन की फ़िल्म थी, ‘मुझे जीने दो’ (1963), ‘पड़ोसन’ (1967) और बी.आर. चोपड़ा की कई मशहूर फ़िल्में जैसे ‘गुमराह’ (1963), ‘वक़्त’ (1965) और ‘हमराज़’ (1967) शामिल हैं। उन्होंने एक अनोखी फ़िल्म ‘यादें’ (1964) भी बनाई, जिसमें उन्होंने एक नया प्रयोग किया। इस फ़िल्म में वह अकेले अभिनेता थे और कोई डायलॉग भी नहीं था। उन्होंने 1970 की दहाई के आख़िर तक फ़िल्मों में अदाकारी की। उसके बाद कुछ समय के लिए फिर से मशहूर फ़िल्म ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ (2003) में दिखाई दिए, जिसमें उनके बेटे संजय दत्त मुख्य अभिनेता थे। उनके प्रोडक्शन की फ़िल्म ‘दर्द का रिश्ता’ (1982) उनकी पत्नी नरगिस की याद में बनाई गई थी। नरगिस की 1981 में पैंक्रिएटिक कैंसर से मौत हो गई थी। इस फ़िल्म की कहानी भी इसी विषय पर है। नरगिस की विरासत के अनुसार उन्हें बंबई के मुस्लिम क़ब्रिस्तान में उनकी माँ जद्दन बाई के बग़ल में दफ़नाया गया।
मुझे सुनील दत्त की फ़िल्म ‘मुझे जीने दो’ (1963) ख़ास तौर पर पसंद आई। हालाँकि, इस फ़िल्म की कहानी मूल रूप से डाकुओं के बारे में थी, लेकिन इसमें इंसानियत की भावना को एक नए ढंग से दिखाया गया था, जिससे इस फ़िल्म को ख़ास पहचान मिली। इस फ़िल्म के गाने साहिर लुधियानवी और जयदेव ने लिखे थे और ये दोनों ही लुधियाना के रहने वाले थे। दत्त को उनकी अदाकारी के लिए कई अवॉर्ड मिले, जिनमें फ़िल्म ‘ख़ानदान’ (1965) के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता अवॉर्ड भी शामिल है। उन्होंने ‘मन जीते जग जीत’ (1973), ‘दुख भंजन तेरा नाम’ (1974) और ‘सत श्री अकाल’ (1977) जैसी कई पंजाबी फ़िल्मों में भी अदाकारी की।
दत्त साहब का सार्वजनिक जीवन भी क़ाबिल-ए-तारीफ़ था। मैंने दत्त साहब के सार्वजनिक जीवन को तब बहुत नज़दीक से देखा था, जब वह 1980 की दहाई में कांग्रेस पार्टी का सदस्य बनकर राजनीति में आए थे। वह एक प्रतिबद्ध गांधीवादी थे और जवाहरलाल नेहरू और डॉ. आम्बेडकर दोनों की बहुत इज़्ज़त करते थे। 31 अक्तूबर, 1984 को श्रीमती इंदिरा गांधी के क़त्ल के बाद हुए सिख दंगों के बाद उन्होंने मुंबई से लेकर अमृतसर के स्वर्ण मंदिर तक के एक लंबे मार्च का नेतृत्व किया था। इन दंगों ने उन्हें झकझोर दिया था और उन्होंने बेक़सूर लोगों की जान लेने के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद की।
वह हिंदुस्तानी संसद के निचले सदन लोकसभा के लिए पाँच बार चुने गए। वह कभी भी कोई चुनाव नहीं हारे, हालाँकि उन्होंने 1990 की दहाई के अंत में तब चुनाव नहीं लड़ा था, जब उनके बेटे संजय दत्त पर लाइसेंस के बिना बंदूक़ रखने और अंडरवर्ल्ड के साथ रिश्ते रखने का इल्ज़ाम लगा था। इन इल्ज़ामों के लगाए जाने से पहले पिता और पुत्र दोनों ने मुंबई के 1993 के मुस्लिम विरोधी दंगों के दौरान शिवसेना और अन्य नव-फ़ाशीवादी संगठनों से मुसलमानों की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरकर आवाज़ बुलंद की थी। यह दंगे बम विस्फोटों के बाद भड़के थे, जिसमें लगभग 300 लोग मारे गए थे और इन का आरोप आई.एस.आई. और दाऊद इब्राहिम जैसे माफ़िया डॉन पर लगा था।
1999 में जब मैं मुंबई गया था, तो मैंने एक मुस्लिम टैक्सी ड्राइवर से बम धमाकों और उसके बाद हुए दंगों के बारे में बातचीत की थी। टैक्सी ड्राइवर की लंबी दाढ़ी थी और वह पक्का मुसलमान था। उसने मुझे बताया कि दिलीप कुमार और उनकी पत्नी सायरा बानो ने मुसलमानों की हिफ़ाज़त के लिए बहुत कुछ किया है, लेकिन सुनील दत्त और उनके बेटे संजय के योगदान को मुंबई के मुसलमान कभी नहीं भूल सकते। वे मुसलमानों पर भीड़ के हमलों को रोकने के लिए गली-गली जाकर ख़ुद लोगों से बातचीत करते थे। उसके यह कहने से मुझ पर बहुत असर पड़ा और मैंने उनसे पूछा, “अच्छा, मुझे बताओ, क्या सुनील दत्त मरने के बाद जन्नत में जाएँगे या नहीं?” वह एक पल के लिए झिझका और फिर बोला, “बाबूजी आपने बहुत ही भड़काऊ सवाल पूछा है और मैं कोई विद्वान भी नहीं हूँ, लेकिन अल्लाह सबकुछ देखता और सुनता है और इंसाफ़ करता है। मेरी राय में दत्त साहब को मुझसे और मेरे बच्चों से पहले जन्नत में भेजा जाना चाहिए।” मुझे कहना चाहिए कि मैंने इससे ज़्यादा निष्पक्ष बयान कभी नहीं सुना और मुझे ख़ुशी है कि वह टैक्सी ड्राइवर कट्टर मौलवियों का पिछलग्गू नहीं था। 1992-93 के हिंदू-मुस्लिम दंगों के बाद दत्त ने एक घटना के विरोध में संसद सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया था। नरगिस की अचानक मौत होने से वह बेहद टूट गए थे और उन पर दो बहुत छोटी बेटियों और एक बेटे की देखभाल करने की ज़िम्मेदारी भी आ गई। उनका जीवन ट्रैज़डी से भरा हुआ था। उनके पहले के जीवन और झेलम ज़िले के खुर्द गाँव से संबंध के बारे में उनका इंटरव्यू मेरी किताब ‘द पंजाब ब्लडेड, पार्टिशन्ड एंड क्लीन्स्ड’ में है। उन्होंने उस इंटरव्यू में मुझे जो बताया वह यह है :
मेरे पिता की मौत तब हुई जब मेरी उम्र केवल पाँच साल की थी और मेरा छोटा भाई सोम एक छोटा बच्चा था। हमारा पालन-पोषण मेरे तायाजी (पिता के बड़े भाई) ने किया। बँटवारे के वक़्त, मैं पंजाब सीमा के हिंदुस्तानी हिस्से में था, लेकिन मेरा बाक़ी परिवार गाँव में था। उस क्षेत्र से हिंदुओं को झेलम के मुख्य शरणार्थी शिविर में ले जाने के लिए सेना का एक ट्रक आया। यह सितंबर की शुरुआत की या शायद दूसरे हफ़्ते की बात होगी। मेरे परिवार के सभी सदस्य ट्रक में सवार हो गए, लेकिन तायाजी नहीं आए, क्योंकि उन्हें लगा कि हालात ठीक हो जाएँगे। उनके जाने से ठीक पहले मेरी माँ ने उन्हें बताया कि उन्होंने अपने सोने के गहने घर में ही छोड़ दिए हैं, क्योंकि उनके पास सब इकट्ठा करने का वक़्त नहीं था। उन्होंने तायाजी को बताया कि गहने कहाँ रखे हैं।
जब बाक़ी लोग चले गए, तो तायाजी गाँव वापस गए। अब वे गाँव में बचे अकेले हिंदू थे। वह गाँव के कुएँ पर गए, जहाँ रोज़ की तरह ही वो गाँवों के लोगों से मिले और हुक्का पिया। सब कुछ सही था, लेकिन शुक्रवार के दिन जुमे के ख़ुत्बे में मस्जिद के इमाम ने हैरानी जताई कि वह गाँव में क्यों रह गए हैं। इसलिए उनके कुछ दोस्तों ने भी उन्हें गाँव से चले जाने की सलाह दी। लेकिन, उन्होंने बेफ़िक्र होने का नाटक किया और अगली शाम फिर से कुएँ पर पहुँच गए। उसके बाद वह घर लौटे, गहने इकट्ठा किए और मेरे पिता के सहपाठी याक़ूब से मदद माँगने के लिए दूसरे गाँव (नवाँ कोट) गए। उन्होंने उनसे कहा कि उनकी जान को ख़तरा है और मेरी माँ के गहने भी उनके साथ हैं। याक़ूब ने उनसे कहा कि फ़िक्र न करें, “अगर कोई तुम्हें मारना चाहेगा, तो उसे तुम पर उँगली उठाने से पहले मुझे और मेरे भाईयों को मारना होगा।”
गाँव से तायाजी के भागने की बात उनके जाने के तुरंत बाद ही सब को पता चल गई थी। नफ़रती लोगों को यह अच्छी तरह से पता था कि वह मदद के लिए याक़ूब के पास गया होगा, क्योंकि गाँव से पैदल भागने का कोई और रास्ता नहीं था। उनमें से कुछ लोग याक़ूब के पास आए और कहा कि ताया को उनके हवाले कर दिया जाए। लेकिन याक़ूब और उनके भाईयों ने अपनी बंदूक़ें निकाल लीं और कहा कि उनका मेहमान उनके लिए अपनी जान से भी प्यारा है। यह सुनकर वे वापस चले गए। इसके बाद, इलाक़े के एक पीर ने याक़ूब से कहलवाया कि वह उससे मिलने आ रहा है ताकि यह पता लगा सके कि वह एक ग़ैर-मुस्लिम की हिफ़ाज़त क्यों कर रहा है। तब याक़ूब ने मेरे तायाजी को तुरंत चले जाने के लिए कहा और उन्हें झेलम तक जाने के लिए एक घोड़ा मुहैया कराया। वह आधी रात को निकले और झेलम में शरणार्थी शिविर में पहुँच गए। दो दिन बाद याक़ूब यह पता लगाने के लिए शिविर में आए कि क्या तायाजी सुरक्षित पहुँच गए हैं। इस तरह मेरा परिवार खुर्द से सुरक्षित बच निकला।
1998 में मुझे खुर्द जाने का मौक़ा मिला। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने मेरी गुज़ारिश पर ख़ास ग़ौर किया। मैं दिलीप कुमार के साथ आया था। हमारे गाँव के लोगों को इसकी ख़बर पहले ही मिल गई थी। कुछ लड़कों ने मेरी फ़िल्में भी देखी थीं। जब मैंने उस धरती पर पैर रखा जहाँ मेरा बचपन बीता था, तो एक ऐसा एहसास था जिसे मैं लफ़्ज़ों में बयाँ नहीं कर सकता। बुज़ुर्ग महिलाएँ मुझे मेरे घर के नाम ‘बज्ज्या’ से बुला रही थीं, क्योंकि मेरा असली नाम बलराज है। वे जानना चाहती थीं कि मेरी माँ कैसी हैं। जब मैंने उन्हें बताया कि मेरी माँ मर चुकी हैं, तो वे रोने लगीं।
मेरे परिवार को मेरे चाचा के एक दोस्त याक़ूब ने बचाया था। मैं 1947 के उन भयानक दिनों में याक़ूब के मेरे परिवार के सदस्यों को बचाने के ठीक आधी सदी बाद उनसे मिलने उनके गाँव नवाँ कोट गया था। उनकी मौत हो चुकी थी और उनके बच्चे भी अब वहाँ नहीं रहते थे। बहरहाल, मैं वहाँ पर कुछ लोगों से मिला और उनसे सलाम दुआ की। उन्होंने याक़ूब के बच्चों को ख़बर पहुँचाने का वादा भी किया।
मैं वहाँ से पूरी तरह से आश्वस्त होकर लौटा कि अच्छे और बुरे लोग सभी समुदायों में होते हैं और किसी एक शख़्स की वजह से पूरे समुदाय को सज़ा नहीं मिलनी चाहिए।
नरगिस की याद में सुनील दत्त ने नरगिस दत्त मेमोरियल फ़ाउंडेशन की स्थापना की, जिसने हिंदुस्तान में कई कैंसर अस्पताल बनाए हैं। वह शुरुआती दौर की बंबई की उन हस्तियों में से थे, जिन्होंने इमरान ख़ान के कैंसर अस्पताल के लिए पैसे जुटाने के अभियान में हिस्सा लिया था।
महान् मेगास्टार, इंसानियत के पैरोकार और पूरी दुनिया के होते हुए भी भीतर से पंजाबी सुनील दत्त की मौत 25 मई, 2005 को मुंबई के बांद्रा स्थित उनके घर पर नींद में ही हो गई थी। उस वक़्त वह हिंदुस्तान के युवा मामले और खेल मंत्रालय के मंत्री थे।
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