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एक प्रेम कविता

ek prem kavita

सारिका श्रीवास्तव

सारिका श्रीवास्तव

एक प्रेम कविता

सारिका श्रीवास्तव

और अधिकसारिका श्रीवास्तव

    ऋतुओं के समयचक्र को

    पूरा कर

    फिर गया

    एक नया बसंत।

    पर

    पिछले बसंत की

    मुलाक़ात अभी भी

    ताज़ी-सी लगती है।

    मुझे आज भी

    अच्छा लगता है

    फूली हुई सरसों का

    खेत।

    मैं अभी तक

    महसूस कर रही हूँ

    तुम्हारे गर्म हाथों का

    वह स्पर्श

    जो झिझकते-सकुचाते

    सौगात में दिए थे तुमने मुझे

    एक पीली पड़ी

    बसंत की शाम को।

    मैं नहीं भूल पाती

    सूख कर काले पड़े

    उन चेहरों को

    जो रोटी के चंद टुकड़े पाने

    आपस में ही लड़ा दिए गए हैं।

    और इन तमाम दिनों को

    जो बारूद, बंदूकों और अब

    इंसानी ख़ौफ़ के धुएँ से

    काले हो गए हैं

    बस्तर, झाबुआ, दंतेवाड़ा

    के नाम पर।

    जब-जब नया बसंत आता है

    घोटुल की गमक

    काले और पिचके चेहरे, सफ़ेद दाँत

    खुरदुरे हाथ

    और

    मासूस मुस्कुराहटें

    बरबस ही याद जाती हैं

    और

    सिहर जाती हूँ

    बसंत की हल्की ठंडाई से.

    सिहर जाती हूँ

    बसंत की ज़मी हुई ठंड

    से काली पड़ी

    फसल को देखकर

    कि

    फिर झूला झूलेंगे

    जाने कितने शरीर

    कुछ मरने के बाद

    कुछ ज़िंदा ही।

    मैं अब नहीं चाहती

    पीले बसंत।

    मैं चाहती हूँ अब

    नए रंग का बसंत

    जिसमें तने हुए हाथ हों

    बंधी हुई मुट्ठियाँ हों

    और

    उन काले, पिचके चेहरों पर लगी

    सफ़ेद चमकती आँखें

    जो

    आगे बढ़ रही हों

    अपने हिस्से का बसंत

    का रंग पाने के लिए।

    और

    तब

    महसूस करना चाहती हूँ

    तुम्हारी सांसों की गर्माहट को

    अपने होंठों पर।

    स्रोत :
    • रचनाकार : सारिका श्रीवास्तव
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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