Font by Mehr Nastaliq Web

दबि गय पूँछि फेंटारा कै

dabi gay punchhi phentara kai

मनोज मिश्र ‘कप्तान

मनोज मिश्र ‘कप्तान

दबि गय पूँछि फेंटारा कै

मनोज मिश्र ‘कप्तान

और अधिकमनोज मिश्र ‘कप्तान

    बरखा कै सीजन चलत रहा, कुछ होत रही बूँदाबाँदी।

    काका चिंतय मा सोइ गये, बड़कई भैंसिया है माँदी।

    लघुसंका कै जब जोर परा, गोबरे काका तब जागि गये।

    भुइँ मा डंडा पटकिन जानिन, किरवा फतरिंगवा भाग गये।

    कुलि वर से जब निहचिंत भये, तब जेब टटोलिन कुर्ती कै।

    फिर ठोकिं-पीटि मुँह मा डाइन, अमल मिटाइन सुर्ती कै।

    सुर्ती जब आपन असर किहिस, तब देह तूरि अँगिराय उठे।

    कौनौ पुरान फिल्मी गानक धुनि, खटियै पर से गाइ उठे।

    कोटा से तेल मिला नाहीं, ढेबरिउ बुतानि ताखे वाली।

    हम तौ सच्चाई कहेन सिर्फ ना, बात कहेन माखै वाली।

    अपनौ हथवा नाही सूझै, अस राज रहै अँधियारा कै।

    बस वही समय जूतक नीचे,कहुँ दबि गय पूँछि फेंटारा कै।

    काका तौ अपने मौजम रहै, ना उनका कुछू देखाय परा।

    पर काली राति नाग काला, जस पूँछि दबी घुघुवाय परा।

    आतंकवाद कै सग चाचा, साँपय वाला पच्छ लिहिस।

    यै गल्तिस गोड़ धरिन वहपै, जानि बूझि कै भच्छि लिहिस।

    काका जुरतै अहदंकि गये, कुछ आव बाव बक्कै लागे।

    हे राम कहौ का होइगा, सब फाटि परा एक्कै लागे।

    हल्का सा चक्कर घस आवा, वै गोड़ पकरिकै बैठि गये।

    मुँह से कुछ झाग वाग निकला, काका भुँइयें मा ऐंठ गये।

    आवाज सुनिन जब काका कै, घरवाले जुरतै चौंकि उठे।

    थे वफादार कबरा झबरा, वइ दूनो कुकुर भौंकि उठे।

    कोठरी से दुल्हनिया बोली, देखो बप्पा का का होइगा।

    मुरझान मुँहप पानी डउते, गँउवा मा गोहरउवरि परिगा।

    काकी सुनिकै हैहासि गईं, गोबरे काका के बारे मा।

    झट गल्ली से बाहर आईं, वै वल्ली रहीं वसारे मा।

    जस गाँव भरेम हइया परिगा, आधे सुनि कै सनपाति गये।

    हे दइव सुनायव का सबका,आखिर अतनी राति गये।

    काका का देखै गाँव जुटा, वहमा एक जने असोक रहै।

    रस्ता भर थर-थर-थर काँपै,हद से ज्यादा डरपोक रहै।

    हालत काँपत हनुमान सुमिरि, वै आपन बात कहै लागे।

    कसकै लोधियाना छोड़ि छाड़ि,मजबूरिम गाँउप रहै लागे।

    गरमी बरखा कै भैया, हम नाँउ सुने घबराइत है।

    होली से राम बियाहे तक, हम खटियै पइहाँ खाइत है।

    जमराज गये रिसियाय मनौ, दयुक दूत उत्पात किहिन।

    है कइव साल से बचा गाँव, काका फिर से सुरुआत किहिन।

    यहि बातचीत के बीचेन मा, बँसवारी मा कुछ खुरुकि गवा।

    डियुहार कसम अस जानि परा, सबकै परान जस सुरुकि गवा।

    छेदी बोले यहि रस्ता पर, हम कहेन बाँस झोपड़ा होई।

    है आज उछिंदी राति मनौ, पक्का विछखोपड़ा होई।

    डोड़हा साँपेक बाभन समझौ, जनमजात सिधवा मानौ।

    धमिना या भागि लोहारिनि है, या तौ मजगिधवा जानौ।

    हे सेषनाग कै सग वंसज, अब चले जाव ना फुँह देखब।

    जौ बड़िन भागि तौ भोर पहर, अब मेहरारू कै मुँह देखब।

    डेरसटा रहैं मुल तब्बौ सब, एक साधेन काकक पास चले।

    हिंया दुआरेप काका कै, खटिया पर उखड़ी साँस चलै।

    काका कै नारी बंद रहय, साँसौ कुछ नेरे दूरि चलै।

    नौसिखिया लड़िकन के झारै,तनिकौ साँपेक कूरि चलै।

    कुछ झूठै तौ कुछ साँचि रहे, कुछ नागिन धुनि पै नाचि रहे।

    कुछ काली कलकत्ता कहिकै, लोना चम्मारिन बाँचि रहे।

    कुछ समझावत हैं फिसिर फिसिर, कुछ गोड़ चलावैं घिसिर घिसिर।

    सियाराम, कुंटल पाँडे, तहुलिक आये अवधेस मिसिर।

    ढाँढ़स बँधाइ एय तीन जने, अपनौ सबकै जिव बड़ा किहिन।

    काका का चुंगी नाका पर,धीरेस उठाय कै खड़ा किहिन।

    मंत्रन कै खेल सुरू होगा, फिर चँवर मुहप मारै लागे।

    वासुकी नाथ का सुमिरि-सुमिरि, सब काका का झारै लागे।

    काका पहिलेन कमजोर रहे, यहि झाड़फूँक मा कँहरि दिहिन।

    जब रोइ पीटि कुलि करम भवा, तब सैंतालीस सौ लहरि दिहिन।

    कुछ देर हुँवय आराम किहिन, टेकत टाकत घर का आये।

    साँसति आफति मा जिव परान, हर साल यहै बरखा आये।

    स्रोत :
    • पुस्तक : अवधी मिठास (पृष्ठ 35)
    • रचनाकार : मनोज मिश्र ‘कप्तान’
    • प्रकाशन : सर्वभाषा प्रकाशन, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2025

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY