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समुद्र

samudr

रमेश प्रजापति

और अधिकरमेश प्रजापति

    असंख्य रहस्यों से लबालब

    समुद्र घोलता है अपना स्वाद

    हमारे लहू

    हमारे आँसू

    और हमारे पसीने में

    गिरती-पड़ती

    पत्थरों पर सिर पटकतीं नदियाँ

    बैठकर समुद्र की गोद में

    भूल जाती हैं दुःखों की कड़वाहट

    और लंबे सफ़र की थकान

    चाँदनी रात में

    अनगिनत हाथों से लिखता है समुद्र

    रेत की सलेट पर अपनी प्रार्थनाएँ

    और दुःखों के गीत

    संभावनाओं से भरी नाव

    लौटती है जब समुद्र के विराट वैभव से

    इंतज़ार में डूबी बस्ती की आँखों से

    झरते हैं ख़ुशियों के फूल

    पलकें झुकाए साँझ

    सूरज को माथे पर लगाकर

    सिंदूरी तिलक-सा

    उतर जाती है समुद्र की तलहटी में

    जिसे सुबह-सवेरे

    बच्चे-सा गोद में उठाकर उषा

    आसमान के आँगन में खेलने छोड़ देती हैं

    जिसका मुँह चूमने को लहरें आतुर रहती हैं

    दिनभर ऐसे उछलता रहता समुद्र

    जैसे स्कूल से लौटा बच्चा

    उझलता रहता है छींके पर टंगी

    रोटी की डलिया उतारने की ख़ातिर।

    स्रोत :
    • रचनाकार : रमेश प्रजापति
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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