Font by Mehr Nastaliq Web

अँधेरे का गान

andhere ka gaan

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

तिन उयेविच

तिन उयेविच

अँधेरे का गान

तिन उयेविच

और अधिकतिन उयेविच

    हम भारतीय, हम रात्रि के विधान पर जीते हैं। हम शाश्वत में डूबे हैं, एक में, रवींद्रनाथ ठाकुर ने कहा है।

    पता नहीं, संभव है मुझमें अनेक आत्माएँ हों, परंतु यदाकदा मैं भी भारतीय हो जाता हूँ। जिधर भी जाऊँ, जो भी करूँ, लगता मुझे कि रात्रि के, शाश्वत के, मौन के विधान के अंतर्गत हूँ। मानो मैं ईश्वर के हृदय में हूँ। मानो मैं देवताओं की हथेलियों पर हूँ। और, आश्चर्य की बात है, मैं उनमें से हूँ जो घास पर लुढ़क सकते हैं और नदी को देखते-देखते सो सकते हैं। मैं निगलता हूँ गहन की गहनता, मौन का मौन और एकांत का कंपन।

    मुझे परवाह नहीं जोड़ लगी आस्तीनों की, मैं जानता हूँ कि संसार भुलावा है। मुझे परवाह नहीं कि लोग मेरा आदर करें या मेरे बारे में बोलें, मैं जानता हूँ कि संसार भुलावा है। सुखी या दुखी होना तब मेरे लिए एक ही बात है, क्योंकि सुख और दुख भी भुलावा हैं; आनंद केवल ईश्वर के हृदय में है, अर्थात् हमारी सच्ची पीड़ाओं और हमारे झूठे सुखों की क्षण भंगुरता की नगण्यता के बोध में।

    संभवत: इसीलिए निष्कर्ष निकाला जाता है कि मैं धार्मिक नहीं हूँ, दूसरे यह भी कि मैं बस क्रांतिकारी नहीं हूँ। अर्थात्, मेरी आँखें मृत्यु के खोखले गड्ढों में ताकती रहती हैं।

    मुझे भय है, मुझे भय है कि हमारा विज्ञान भी कहीं मुख्यतः मात्र तीखा रंग तो नहीं भुलावे की चादर पर। अत्याधुनिक विज्ञान और क्या जोड़ सकता है प्राचीन, उपनिषदों की मनीषा में? सर्वकुशल मनुष्य तो धरती पर ही अपनी इच्छाएँ झाड़ देता, जब लालसाओं से मुक्त हो जाता है, वह ब्रह्म के समान और उससे एकाकार हो जाता है। परंतु समझ, विज्ञान अथवा पवित्र कर्म हमें समग्र पुण्य तक नहीं ले जा सकते; केवल ध्यान का परिधान और स्वर्गीय परमानंद ही ईश्वर के अंतर तक ले जाते हैं। इस रहस्य से उत्पन्न हुआ एक सौंदर्यशास्त्र, जिसके कारण आज भी मैं प्रेम से निहारता हूँ सुदूर, अपरिचित, स्वतंत्रतादायक बंगाली भूमि की ओर।

    महान, विचित्र और अनूठे पूर्व! तेरे अत्याचारियों से अधिक तेरे कवियों के हृदय से हमारा सहोदरी परिचय है, हालाँकि शाक्यमुनि से देवता और राजा नहीं रहे, जबकि नोबल पुरस्कार भी मिलते हैं ठाकुर जैसे को (संभवत: ऐसा ही भी भारतीय जैसा कि तुर्गनेव रूसी)।

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 42)
    • रचनाकार : तिन उयेविच
    • प्रकाशन : ज़ाग्रेब, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY