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केवल ताली ही तो है : प्रयागराज के NCZCC में ‘ओथेलो’ और रवींद्रालय में ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ देखते दर्शकों का स्त्री-द्वेष

बीते दिनों इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में दो महत्त्वपूर्ण नाटकों का मंचन हुआ—19 मार्च 2026 को एनसीज़ेडसीसी (NCZCC) में शेक्सपीयर के ‘ओथेलो’ का, जिसका निर्देशन आलोक नैयर ने किया और 26 मार्च 2026 को रवींद्रालय में कालिदास के ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ का, जिसका निर्देशन हरिओम कुमार ने किया। मूल रूप से क्रमशः अँग्रेज़ी और संस्कृत में लिखे गए इन नाटकों का मंचन हिंदी में किया गया, ताकि दर्शक उनसे अधिक सहज रूप से जुड़ सकें।

यह ध्यान देने की बात है कि पिछले कुछ वर्षों में इलाहाबाद में नाटक देखने और नाटकों के मंचन की एक सजीव परंपरा विकसित हुई है। इसका एक बड़ा कारण शहर में NCZCC की उपस्थिति और अधिकांश प्रस्तुतियों का निःशुल्क होना भी है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक भरतमुनि नाट्य समारोह के अंतर्गत पाँच दिनों तक नाट्य-प्रदर्शन हुए हैं; जिनमें ‘चंदा बेड़नी’, ‘गुड़िया की शादी’, ‘हयवदन’ और ‘बकरी’ सरीखी प्रस्तुतियाँ शामिल रही हैं।

यहाँ मैं ‘ओथेलो’ और ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ की प्रस्तुति के शिल्प और उनके दर्शकीय प्रभाव पर कुछ बातें करना चाहता हूँ।

सबसे पहले ‘ओथेलो’ की बात। इस प्रस्तुति को देखते हुए बार-बार यह आभास हो रहा था कि इसकी मंच-परिकल्पना पर विशाल भारद्वाज की बीस साल पुरानी फ़िल्म ‘ओमकारा’ का प्रभाव है। नाटक में प्रयुक्त पार्श्व-संगीत एकरंगी, रहस्यप्रधान और लगातार तनाव रचने वाला था। परिणामतः ओथेलो और डेसडीमोना के प्रेम-दृश्य भी अपेक्षित सहजता प्राप्त नहीं कर सके। इयागो और एमिलिया के घरेलू संवादों के पीछे भी वही सस्पेंसपूर्ण संगीत चलता रहता था, जिससे दृश्य और ध्वनि के बीच असंगति पैदा होती थी।

इयागो के पात्र को देखकर कई बार ऐसा लगा मानो उसके हावभाव और देहभाषा सीधे ‘ओमकारा’ के एक प्रमुख किरदार लंगड़ा त्यागी से उधार लिए गए हों। हालाँकि नाटक का विषय-प्रवेश प्रभावशाली था और उसने शुरुआत से ही दर्शकों की रुचि बनाए रखी, पर प्रस्तुति की एक बड़ी कमी यह रही कि उसने ओथेलो के मनोविज्ञान की उस बुनियादी गाँठ को पर्याप्त महत्त्व नहीं दिया, जो मूल नाटक में उसकी त्रासदी का कारण बनती है। ओथेलो का ‘मूर’ होना, उसका अश्वेत होना, उसका सामाजिक असुरक्षा-बोध—यही वह भूमि है जिस पर इयागो की साज़िश सफल होती है। शेक्सपीयर ने इसे स्पष्ट रूप से रचा था, पर मंचन में यह परत लगभग अनुपस्थित रही।

‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ की प्रस्तुति में समस्या कुछ दूसरी थी। वहाँ वह नाट्य-ऊर्जा दिखाई नहीं दी जो दर्शक को लगातार अपनी जगह पर बाँधे रख सके। विशेष रूप से दुष्यंत और शकुंतला के मिलन से पहले का कथानक अत्यधिक लंबा और शिथिल लगा। दूसरी ओर, जहाँ नाटकीय संभावनाएँ सबसे अधिक थीं—जैसे शकुंतला का दुष्यंत से मिलन, उसके प्रेम का दैवीय आयाम या अपने अधिकार के लिए दुष्यंत से उसका प्रतिवाद—उन्हें अपेक्षाकृत जल्दबाज़ी में समेट दिया गया।

दरअस्ल, लगभग एक घंटे की सामग्री को कहीं अधिक लंबा खींच देने से दृश्य-विधान की कसावट ढीली पड़ने लगी थी। दर्शक बार-बार उठकर कॉरिडोर में टहलते दिखाई दे रहे थे। इसके पीछे केवल प्रस्तुति की लंबाई नहीं, बल्कि कथ्य को दृश्य में रूपांतरित करने की सीमाएँ भी थीं।

उदाहरण के लिए, कालिदास जब संकेत करते हैं कि शकुंतला के वन छोड़ने से समूचा वन-जीवन व्यथित हो उठता है तो इस भाव को मंच पर रूपायित करने की असंख्य संभावनाएँ हैं। लेकिन यदि उसे केवल संवाद के माध्यम से कह दिया जाए तो उसका प्रभाव कम हो जाता है। इसी तरह प्रियंवदा का लगभग हर संवाद के बाद हँसना भी कई जगहों पर अनपेक्षित प्रतीत हुआ।

दुष्यंत की भूमिका निभाने वाले अभिनेता का अभिनय भी कालिदास के धीरोदात्त नायक की अपेक्षा पूरी तरह नहीं कर सका। कायिक और वाचिक अभिनय दोनों स्तरों पर उसमें एक प्रकार की झिझक दिखाई देती रही।

हाँ, प्रस्तुति में प्रयुक्त गीत अपने स्वर और उतार-चढ़ाव में प्रभावी थे। प्रकाश-योजना भी उल्लेखनीय थी। लेकिन अंततः वही प्रश्न सामने आता है—कथ्य और उसके मंचीय रूपांतरण का।

जावेद अख़्तर ने कभी टेलीविज़न के संदर्भ में कहा था कि दृश्य-माध्यम में संवाद का प्रयोग ग़रीब के टेलीग्राम की तरह होना चाहिए। नाटक के संदर्भ में भी यह बात कुछ हद तक लागू होती है। प्रस्तुति के बाद बातचीत में संस्कृत पढ़ने वाले एक मित्र ने निराश स्वर में कहा, “कपिलदेव द्विवेदी के अनुवाद को मंच पर चढ़कर बोल देना नाट्य-प्रस्तुति नहीं होता।” हालाँकि उसी मित्र को इस बात का संतोष भी था कि संस्कृत जैसी लगभग लोक-विलुप्त भाषा के साहित्य को मंच तक लाने का प्रयास कम से कम हो तो रहा है। इस अभागे देश में कभी-कभी यह भी कम उपलब्धि नहीं लगती।

लेकिन इन दोनों प्रस्तुतियों के बारे में सोचते हुए मेरे मन में सबसे अधिक देर तक जो बात ठहरी रही, वह उनके शिल्प से अधिक दर्शकों की प्रतिक्रिया थी।

वास्तव में अभागे शायद हम हैं।

हमारा स्त्री-द्वेष एक सामाजिक इकाई के रूप में आज तक कम नहीं हुआ, संभवतः और अधिक गहरा हुआ है। फ़िल्मों, गीतों, रीलों और तमाम दृश्य-माध्यमों ने स्त्री को धीरे-धीरे एक ‘कॉन्टेंट’ में बदल दिया है—ऐसे कॉन्टेंट में जिसे देखने, परखने, उपभोग करने और उस पर टिप्पणी करने का अधिकार पुरुष-समाज अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है।

‘ओथेलो’ में डेसडीमोना के पिता ब्रेबैंशियो का कथन—“जो लड़की अपने बाप की नहीं हुई, वह तुम्हारी कैसे होगी?”—न केवल ओथेलो को प्रभावित करता है, बल्कि ऐसा लगा कि एनसीज़ेडसीसी में बैठे आधे से अधिक दर्शकों को भी। मानो इस एक वाक्य ने यह सिद्ध कर दिया हो कि स्त्री अंततः धोखा ही देती है।

यह तब था जब दर्शक डेसडीमोना के प्रेम को अपनी आँखों से देख चुके थे। वे इयागो की चालबाज़ियों से भी परिचित थे। वे जानते थे कि वह किस प्रकार की घृणा और ईर्ष्या से प्रेरित है। इसके बावजूद ऐसा प्रतीत होता था कि दर्शक-दीर्घा का एक बड़ा हिस्सा अपने अवचेतन में डेसडीमोना को ही दोषी मान चुका है।

एमिलिया से इयागो का छलपूर्वक रूमाल हासिल करना, फिर उसका उपहास करना और उस पर दर्शकों की तालियाँ—इन सबने बार-बार यह महसूस कराया कि हम केवल नाटक नहीं देख रहे, अपने सामाजिक अवचेतन को भी देख रहे हैं।

‘ओथेलो’ की त्रासदी केवल ओथेलो के भ्रम की नहीं है। वह उस समाज की त्रासदी भी है जो एक स्त्री की आवाज़ पर विश्वास नहीं करता, पर एक पुरुष की साज़िश पर आसानी से यक़ीन कर लेता है।

शेक्सपीयर ने डेसडीमोना की हत्या को एक निर्मम अपराध की तरह रचा था। लेकिन हमारे बीच बैठे अनेक दर्शक उसे लगभग एक न्यायोचित परिणाम की तरह ग्रहण कर रहे थे। यह प्रतिक्रिया बेचैन करने वाली थी।

और फिर ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’!

यहाँ नाटक का कथानक बदल गया था, पात्र बदल गए थे, समय बदल गया था; पर दर्शकीय प्रतिक्रिया का स्वर कई जगह वैसा ही था।

शकुंतला को छोड़कर जाने वाला दुष्यंत है। अपने प्रेम और अपने अधिकार की पहचान के लिए गर्भावस्था में राजसभा तक पहुँचने वाली शकुंतला है, लेकिन जब दुष्यंत कहता है कि “तुम जैसी स्त्रियाँ राजसुख के लिए किसी भी स्तर तक गिर सकती हैं” या “स्त्रियों में बिना सिखाए ही धूर्तता आ जाती है”, तो उन संवादों पर उठती हूटिंग और बजती तालियाँ केवल मंच पर घट रही घटना की प्रतिक्रिया नहीं थीं। वे हमारे भीतर बैठे संस्कारों की प्रतिक्रियाएँ थीं।

ऐसा नहीं कि दर्शक इन कथनों से सहमत होने का औपचारिक निर्णय ले रहे थे। समस्या इससे कहीं अधिक गहरी है। सामाजिक संस्कारों की लंबी प्रक्रिया हमारी चेतना में इस तरह पैठ बना चुकी है कि स्त्री के विरुद्ध कही गई बात हमें सहज, स्वाभाविक और मनोरंजक लगने लगती है।

एक जागरूक पाठक और दर्शक बनने की प्रक्रिया में शायद सबसे कठिन काम है—अपने भीतर बैठे पूर्वाग्रहों को पहचानना।

हमें अपने देखने, पढ़ने और सुनने की प्रक्रिया में यह लगातार जाँचना होगा कि कहीं हम अनजाने में स्त्री-द्वेष को सामान्य तो नहीं बना रहे; क्योंकि पूर्वाग्रह केवल घृणा के रूप में नहीं आते; वे अक्सर हास्य, मनोरंजन, चुटकुले, तालियों और सहमति के छोटे-छोटे संकेतों में छिपे रहते हैं।

जब यह लगभग मान लिया गया है कि नाटक देखने वालों में शहर का अपेक्षाकृत शिक्षित, छात्र और बुद्धिजीवी वर्ग अधिक उपस्थित रहता है; तब ऐसी दर्शकीय प्रतिक्रियाएँ और अधिक विचारोत्तेजक हो जाती हैं। यदि यह स्थिति वहाँ है, जहाँ हम संवेदनशीलता और आलोचनात्मक विवेक की अपेक्षा करते हैं; तो व्यापक समाज की स्थिति के बारे में क्या कहा जाए? 

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में जिस ‘जनता की चित्तवृत्ति’ की बात करते हैं, यदि उसका एक हिस्सा यह भी है तो फिर हमारे साहित्य और हमारी लोकप्रिय संस्कृति में स्त्री-द्वेष की उपस्थिति पर इतना आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए। यहाँ ‘गुनाहों का  देवता’ के स्त्री-द्वेषी होने पर हैरान आख़िर क्यों हुआ जाए!

बड़े-बड़े बहि गएँ, चिरैयाँ बोले—केत्ता पानी!

शायद इसी कारण आज Animal जैसी फ़िल्मों की लोकप्रियता पर चर्चा करते हुए भी हमें केवल फ़िल्म की नहीं, अपने दर्शक होने की आदतों की समीक्षा करनी चाहिए।

काश, नाटक शुरू होने से पहले हम दर्शकों में लारा मल्वी के कुछ लेख ब्रोशर के रूप में या उसके साथ बाँट सकते! काश, हम मंच पर बैठने से पहले ‘थप्पड़’ जैसी फ़िल्म देखकर आते! काश, हम यह समझ पाते कि किसी भी समाज में हिंसा की शुरुआत हमेशा हिंसा से नहीं होती; कई बार वह हँसी से शुरू होती है और तालियों से वैधता पाती है।

“केवल थप्पड़ ही तो है...” जैसे हम यह कहकर किसी अनुभव को छोटा नहीं कर सकते, वैसे ही शायद हमें यह भी नहीं कहना चाहिए—“केवल हँसी ही तो है...” या “केवल ताली ही तो है...” क्योंकि कई बार सबसे बड़ी बातें वहीं छिपी होती हैं, जिन्हें हम सबसे छोटी बात समझकर टाल देते हैं।

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