Font by Mehr Nastaliq Web

द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र!

drut jharo jagat ke jeern patr!

सुमित्रानंदन पन्त

सुमित्रानंदन पन्त

द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र!

सुमित्रानंदन पन्त

और अधिकसुमित्रानंदन पन्त

    द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र,

    हे स्त्र्स्त ध्वस्त, हे शुष्क शीर्ण!

    हिम-ताप-पीत, मधुवात-भीत,

    तुम वीतराग, जड़ पुराचीन!!

    निष्प्राण विगत युग! मृत विहंग!

    जग नीड़ शब्द औ’ श्वास हीन,

    च्युत, अस्तव्यस्त पंखों—से तुम

    झर-झर अनंत में हो विलीन!

    कंकाल-जाल जग में फैले

    फिर नवल रुधिर,—पल्लव लाली!

    प्राणों की मर्मर से मुखरिन

    जीवन की मांसल हरियाली!

    मंजरित विश्व में यौवन के

    जग कर जग का पिक, मतवाली

    निज अमर प्रणव-स्वर मदिरा से

    भरदे फिर नव युग की प्याली!

    गा कोकिल...

    गा, कोकिल, बरसा पावक कण!

    नष्ट भ्रष्ट हो जीर्ण पुरातन,

    ध्वंस भ्रंश जंग के जड़ बंधन!

    पावक-पग धर आवे नूतन,

    हो पल्लवित नवल मानवपन!

    गा, कोकिल, भर स्वर में कंपन!

    झरें जाति-कुल-वर्ण-पर्ण घन,

    अंध नीड़-से रूढ़ि रीति छन,

    व्यक्ति-राष्ट्र-गत राग-द्वेष रण,

    झरें, मरें विस्मृति में तत्क्षण!

    गा, कोकिल, गा, -कर मत चिंतन!

    नवल रुधिर से भर पल्लव-तन,

    नवल स्नेह-सौरभ से यौवन,

    कर मंजरित नव्य जग जीवन,

    गूँज उठें पी-पी मधु सब जन!

    गा, कोकिल, नव गान कर सृजन!

    रच मानव के हित नूतन मन,

    वाणी, वेश, भाव नव शोभन,

    स्नेह, सुहृदता हो मानस-धन,

    करें मनुज नव जीवन यापन!

    गा, कोकिल, संदेश सनातन!

    मानव दिव्य स्फुलिन्गर चिरंतन,

    वह देह का नश्वर रज कण!

    देश काल हैं उसे बंधन,

    मानव का परिचय मानवपन!

    कोकिल, गा, मुकुलित हों दिशि-क्षण!

    स्रोत :
    • पुस्तक : सुमित्रानंदन पंत रचना संचयन (पृष्ठ 73)
    • संपादक : कुमार विमल
    • रचनाकार : सुमित्रानंदन पंत
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY