शादी
shadi
अक्सर कुछ औरतें कहती हैं :
मेरा पति, अगर मछली पकड़ना चाहता है, तो पकड़े,
पर मछलियों को फिर साफ़ भी ख़ुद ही करे।
लेकिन मैं उनमें से नहीं हूँ।
रात के किसी भी वक़्त मैं उठ जाती हूँ,
हाथ बँटाती हूँ मछलियों को घिसने में, खोलने में,
टुकड़ों में काटकर नमक लगाने में।
कितना अच्छा लग रहा है। रसोई में सिर्फ़ हम हैं, अकेले।
काम करते हुए कभी-कभी कोहनियों का टकराना,
उसका बातें करना जैसे यह वाली बहुत मुश्किल से पकड़ी,
चाँदी-सी चमकती, उछलती थी हवा में पूँछ हिलाती
और फिर हाथ से नक़ल करके दिखाना।
ख़ामोशी उस वक़्त की, मिले थे जब हम पहली बार,
घिर आती है रसोई में किसी गहरी नदी की तरह।
फिर मछलियों को कटोरे में समेट,
हम चले जाते हैं सोने।
फूट पड़ती हैं कई चीज़ें चाँदी-सी चमकीली :
और बन जाते हैं हम प्रेमी और प्रेमिका।
- पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 153)
- संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
- संस्करण : 2006
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