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फूल गई बारिश में रोटी

phool gai barish mein roti

रमेश प्रजापति

रमेश प्रजापति

फूल गई बारिश में रोटी

रमेश प्रजापति

और अधिकरमेश प्रजापति

    भीग रही है बारिश में समय की चारपाई

    गंगनचुंबी इमारतें

    घरों की कच्ची दीवारें

    पड़ों की कतारें और पूजाघरों की गुंबदें

    बहुत दिनों से

    समुद्र के किनारे खड़ी

    नाव का मन

    मूसलाधार बारिश में भीगकर

    हो गया है भारी

    कुम्हार के कच्चे दीए

    चाक के पास ही पड़े

    तब्दील हो गए फिर से

    मिट्टी में

    चिड़ियों के गीले पंखों पर सवार

    बोझिल साँझ

    लौट रही है धीरे-धीरे

    उदास घरों में

    बारिश से सराबोर टहनियाँ

    चूमती है जब धरती के कोमल गाल

    रोमांचित हो उठता है कण-कण

    रोंवों से फूटने लगते हैं सैकड़ों चश्में

    उंमत्त हो जाती हैं लहरों-सी उमंगें

    गूँजने लगती है, हवा में

    रागनियों की मधुर धुन

    परिंदों के कलरव से

    टूट जाती है घाटी की निस्तब्धता

    कुछ ज़्यादा ही

    चिकने हो गए हैं पहाड़ के कंधे

    और फूल कुछ ज़्यादा ही उजले

    बच्चों की पहुँच से कुछ ज़्यादा ही दूर...

    बारिश में भीगकर पेड़

    महसूस करते हैं जीवन का अकथनीय सुख

    कुलबुलाने लगता है जंगल में हरापन

    बावजूद इसके

    कीचड़ में लिपटा पड़ा है शहर

    गाँव बन गया है दुर्गम द्वीप

    शहर के चैराहे पर

    लिजलिजी हो गई है बारिश में फूलकर

    मेहनतकशों की रोटी!

    स्रोत :
    • रचनाकार : रमेश प्रजापति
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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