यह मार्ग कहाँ जाता है
ye marg kahan jata hai
यह मार्ग कहाँ जाता है
हम किस मार्ग पर जा रहे हैं?
तुम मुझे पुछती हो
मैं कहता हूँ ज़रूरी नहीं प्रत्येक राह कहीं जाए
शायद मार्ग कहीं नहीं जाता
बहुत विषम मार्ग है
हो सकता है उस घाटी पर जाकर ख़त्म हो जाए
हो सकता है इसके किनारे किसी दरिया से मिलते हों
हो सकता है इस रास्ते के पार कोई मुश्किल पहाड़ हो
हो सकता है यह मार्ग ऐसे ही वापिस लौट आए
हो सकता है राहों में से कोई पगडंडी कहीं निकल जाए
कहीं भी किसी नगर-डगर के बग़ैर
रात उतर सकती है
किसी भी छत-अछत के बिना
बरसात आ सकती है
तुम मूक तेज़-तेज़ क़दमों से
मुस्कुराती हुई
और पास हो जाती हो।
- पुस्तक : साथ चलते हुए (पृष्ठ 39)
- रचनाकार : सुतिंदर सिंह नूर
- प्रकाशन : टवेंटी फस्ट सेंचूरी पब्लिकेशन
- संस्करण : 2005
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