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दुनिया काँपि रही थी सारी

duniya kanpi rahi thi sari

मनोज मिश्र ‘कप्तान'

मनोज मिश्र ‘कप्तान'

दुनिया काँपि रही थी सारी

मनोज मिश्र ‘कप्तान'

और अधिकमनोज मिश्र ‘कप्तान'

    दुनिया काँपि रही थी सारी

    दुनिया काँपि रही थी सारी, अइसी विकट बिमारी नाय

    हर मनई के मुँह पर जाबा।

    पोता चकित, डरे थे बाबा।

    गिरजाघर गुरुद्वारा सूनें,

    बंद पड़े पट, कासी, काबा।

    हर पल दहसत मा नर नारी, अइसी विकट बिमारी नाय।

    कामकाज कै भट्ठा बइठा।

    बिना काम घर, पट्ठा बइठा।

    आधा साल बीतिगा लेकिन

    ना कोय कहूँ, इकट्ठा बइठा।

    बइठै सब घर मा सरतारी, अइसी विकट बिमारी नाय।

    अपने हाथे आपन रक्षा।

    मुँह मा बाँधि चलैं गलमच्छा।

    खुद भी बचैं, बचावैं सबका,

    आगे ईस्वर करिहैं अच्छा।

    सब कुछ देखत कृष्ण मुरारी। कैसी विकट बिमारी नाय।

    स्रोत :
    • पुस्तक : अवधी मिठास (पृष्ठ 58)
    • रचनाकार : मनोज मिश्र ‘कप्तान’
    • प्रकाशन : सर्वभाषा प्रकाशन, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2025

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