Font by Mehr Nastaliq Web

फिर बनूँगी औरत मैं

phir banungi aurat main

लूस लेस्कूरे

लूस लेस्कूरे

फिर बनूँगी औरत मैं

लूस लेस्कूरे

और अधिकलूस लेस्कूरे

    I

    जन्म लिया अगर दुबारा

    फिर बनूँगी औरत ही मैं
    1

    हनीसकल2 से लिपटी, पत्तों से ढँकी

    न बदलूँगी किसी भी चीज़ से

    अथक पंछी की इस देह को

    सितारों का डेरा है जहाँ

    मेरा शरीर

    झूलता हैं चाँद की जादुई ताल पर,

    मेरे कूल्हे, मेरी उदार कोख,

    मेरे महीने, मेरे साल।

     

    यह मेरा शरीर

    —वफ़ादार प्रतिपक्ष है एकरसता का—

    इसमें फूटती हैं कलियाँ, आता है महीना,

    बनाता है संबंध दूसरे से, देता है जन्म

    और फिर बढ़ता है बुढ़ापे की ओर।

     

    II

    फिर बनूँगी औरत ही मैं

    मेरा अपना प्रवेश द्वार है कोख के नीचे

    खुलता है जो उस असीम ब्रह्मांड में

    जो भीतर समाया है हमारे

    खुलता है एक सुदूर लेकिन गहन दुनिया के

    अँधेरे उजालों में

     

    मैं हूँ लगभग पेड़-सी

    मेरे भीतर पनपती है ज़िंदगी,

    मुहब्बत, दुःख।

     

    पंछी हूँ मैं, रस्ता हूँ मैं

    झरना हूँ

    सायरन हूँ गहराइयों का :

    किसी अनबूझ आनंद से सराबोर है

    मेरा शरीर।

    मैं शक्ति हूँ सबसे बड़ी।

     

    III

    होऊँ चाहे पैदा अँधेरी सदियों में

    और अंत हो मेरा चाहे धधकते अलाव की ज्वाला में

    औरत ही बनूँगी फिर से। मुझे भाती है यह अणु की-सी गहनता

     

    कँपकँपाती है जो हर डिम्बग्रंथि में,

    मेरी छातियों की उस कोमल भूलभूलैया में।

    मैं फिर जन्म दूँगी विशालकाय हाथी की खाल पर

    गुफा के अंदर,

    जलन के आँसू रोऊँगी चाँदनी रातों में

    और फिर प्यासी, पीऊँगी पानी सितारों भरी कोख वाले

    झरने का।

     

    जन्म लिया अगर फिर से

    कोई पूछे तो कहूँगी

    हाँ फिर औरत ही बनूँगी।       

    स्रोत :
    • पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 185)
    • संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
    • संस्करण : 2006

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY