फ़ोन-बूथ में
लड़की अकड़ गई है हिम से
आँसू बहते
और लिपस्टिक से चेहरे पर धब्बे पड़ते
घबराई है
अपने ठिठुरे कॉलर से बाहर तकती है
उसके पतले नन्हें पंजों
औ’ शिशिर-गाँठ जैसे पोरों में पीड़ा बहती
कान-बालियाँ चमक रही हैं
लौट रही है वह
अपने जैसी सीधी-लंबी
एक गली बर्फ़ीली से है निपट अकेली
पहली बर्फ़ गिरी है
ऐसा पहली बार हुआ है
पहली बर्फ़ फ़ोन पर बातों में चटकी है
बर्फ़ानी पथ उसके गालों पर चमका है
उसके अपमानित कानों पर
यह पहला हिमपात हुआ है।
- पुस्तक : एक सौ एक सोवियत कविताएँ (पृष्ठ 274)
- रचनाकार : अंद्रेई वोज़्नेसेंस्की
- प्रकाशन : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली
- संस्करण : 1975
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