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मृत्यु

mrityu

अमर दलपुरा

अमर दलपुरा

मृत्यु

अमर दलपुरा

और अधिकअमर दलपुरा

     

    एक

    मेरी याद में रवि प्रकाश मर गया
    उसका भले दिनों में साथ था
    मेरी याद में ओम प्रकाश मर गया
    जो बुरे दिनों में साथी था
    जबकि वे मेरी तरह जीवित है
    किसी और जगह पर

    मेरे स्वप्न में मैं ख़ुद ही मर गया
    मैं ख़ुद को याद करने लगा
    मुझे इस बात पर रोना आ रहा था
    कि मुझे कोई रोने वाला नहीं है
    मैं ख़ुद को चुप करने लगा
    कि कोई आँसू पोंछने वाला नहीं है

    मेरी एक बहन तो साँस लेते ही मर गई
    उसका ज़िक्र तक नहीं होता अब
    उसकी कोई जगह भी नहीं इस संसार में
    उसकी कोई याद भी नहीं है परिवार में

    मुझे इस बात पर मलाल भी नहीं होता
    कि मैं धीरे-धीरे सबको भूल गया हूँ
    अब ख़ुद को भूलने कोशिश जारी है
    मैं स्मृतियों के पिटारे में
    धीरे-धीरे राख भर रहा हूँ

    दो

    मेरी मृत्यु होनी थी सो हो गई
    आज इतने सालों बाद चुपचाप लेटा हूँ
    रोने-पुकारने की आवाज़ों के बीच
    मेरे साथ ही शिथिल पड़े हुए हैं
    मेरे हाथ-पैर
    जो टिकते नहीं थे एक जगह
    मेरे साथ ही धूल हो गई
    आशाओं-सी इच्छाएँ
    इच्छाओं-सी लालसाएँ
    जिनके लिए भागता रहा इधर-उधर

    इस दिन को आना था सो आ गया
    जिसकी राह देख था रोज़-रोज़
    जो देखते नहीं थे दिन भर
    वे मेरी मृत देह को छूकर देख रहे हैं
    जिनको नहीं चाहिए था मेरा संग-साथ
    वे हाथ पकड़कर जगा रहे हैं बार-बार

    ऐसा भी नहीं है कि किसी को दुख नहीं है मेरा
    गैल-गिराड़े में इतनी भीड़ उमड़ आई है
    जैसे सारे प्रियजन लौट रहे हैं मिलने
    बच्चे ऐसे देख रहे जैसे
    जीवन को पहली बार देख रहे हैं
    स्त्रियाँ घूँघट से ऐसे झाँक रही हैं जैसे
    मृत्यु को अचरज की तरह देख रही हैं

    जो देख चुके हैं सैकड़ों बार मृत्यु
    वे लकड़ियाँ काट रहे हैं
    शव को सजाने के लिए
    रोली-मोली
    फूल-गुलाल
    एक सफ़ेद परिधान
    और श्मशान के लिए सब साजो-सामान
    इकट्ठा कर रहे हैं

    जिनकी होनी है साल-दो साल में मृत्यु
    उनके लिए मेरी मृत्यु राहत की बात है
    एक ऐसी बात
    वे न चाहते हुए भी चाहते हैं
    मृत्यु का साथ!

    स्रोत :
    • रचनाकार : अमर दलपुरा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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