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माँएँ होती हैं चींटियाँ

manen hoti hain chintiyan

संजीव कौशल

संजीव कौशल

माँएँ होती हैं चींटियाँ

संजीव कौशल

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    चींटियों को देखकर

    माँ की याद आती है मुझे

    वो भी ऐसे ही उतार लेती थी

    कढ़ाई में ज़मी रह गई सब्ज़ी की परत

    रूखी रोटी से

    सबको खिलाने के बाद

    यही लिपटी हुई

    बची रह जाती थी सब्ज़ी

    सब्ज़ी का अहसास दिलाती हुई

    और हमें यह झाँसा

    कि वो रूखी नहीं खा रही

    सब्ज़ी से खा रही है रोटी

    माँएँ वास्तव में चींटियाँ होती हैं

    लगातार चलती रहती हैं वे

    इस कोने से उस कोने

    कामों को जैसे सूँघती चलती हैं

    और दबाकर अपने मज़बूत हाथों में

    लिए चलती हैं उन्हें यहाँ से वहाँ

    वे चींटियों की तरह ही होती हैं ताक़तवर

    तभी तो उठा लेती हैं

    अपने से कई गुना बड़ा घर

    अपने छोटे से सर पर

    चींटियाँ होती हैं माँएँ

    बचाकर रखने की अपनी आदत में

    चीज़ें

    मुश्किल वक़्त के लिए

    चींटियाँ होती हैं वे

    अपने शरीर में

    कि हड्डियों के सिवाए

    कुछ नहीं होता उनमें

    चींटियाँ होती हैं माँएँ

    कि ज़रा-सी आहट से मुश्किल की

    फैल जाती है खलबली उनमें

    और निकल पड़ती हैं वे

    अंडी-बच्चों की हिफ़ाज़त में

    चींटियाँ होती हैं वे

    लड़ते हुए अपनी रक्षा में

    कि दाँतों को गहरा गाड़ देती हैं

    कि मरकर भी नहीं छूटती उनकी पकड़

    घर के दुश्मन से

    चींटियाँ होती हैं माँएँ

    रास्ते में बतराते हुए

    रुककर हालचाल पूछते हुए

    दूसरी चींटियों से

    ये ज़्यादातर लकीरों में चलती हैं

    और भटककर

    फिर से मिल जाती हैं उन्हीं लकीरों में

    कि माँएँ लकीरों में रहती हैं सारी ज़िंदगी

    अपनी हथेलियों की

    चींटियों को मरते नहीं देखा है मैंने

    और ना हीं देख पाते हैं हम

    माँओं को मरते हुए

    दिन-रात खपते हुए

    ईंधन-सी

    घर भट्टी में

    माँएँ होती हैं चींटियाँ

    कि जाने अनजाने कुचल दी जाती हैं

    बेख़बर पैरों से

    चींटियों की तरह।

    स्रोत :
    • रचनाकार : संजीव कौशल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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