स्मृति-गीत-(2)
smriti geet (2)
(1)
भरल-पुरल छथि प्रकृति आइ,
पुनि भेल शिशिर-अवसान प्रिये!
वर वसन्त अणु-अणुकेँ देलन्हि,
अभिनव यौवन-दान प्रिये!
छन-छन मादकता विकसित हो,
पल-पल आकुल प्राण प्रिये!
झूमि-झूमि गबइत अछि कोइलि,
सुख सँ पञ्चम-तान प्रिये!
लक्षित होइछ कली-कली मे
अहँक मधुर मुसकान प्रिये!
विरह-व्यथा-घट मे अँटकल अछि,
तइओ पापी-प्राण प्रिये!
(2)
अछि प्रफुलित रसाल मलयानिल,
पाबि सुरभि-सम्भार प्रिये!
दिनकर परम प्रखरता, रजनी
तारक-मौक्तिक-हार प्रिये!
मधुप पराग, राग, मद-मातल,
प्रस्तुत मधु-भण्डार प्रिये!
गन्धहीन किंशुको देखाबथि,
छवि जनबथि उद्गार प्रिये!
संस्मृतिमय संसार हमर हो
अन्धकार बड़ भान प्रिये!
विरह-व्यथा-घट मे अँटकल अछि,
तइओ पापी-प्राण प्रिये!
(3)
आइ 'भुवन' मे, जीवन मे हो
परिवर्तन आभास प्रिये!
जन-जन केँ नव आश अओर,
वसुधामे अछि उल्लास प्रिये!
सब पुलकित, सब अमल-धवल,
सबहिक मुखपर मृदु-हास प्रिये!
प्रेम-देव छथि पुनः बिछओने,
थल-थल प्रेमक फाँस प्रिये!
अश्रु-गरल हम पीबि बिताबी,
जीवन मृतक-समान प्रिये!
विरह-व्यथा-घट मे अँटकल अछि,
तइओ पापी-प्राण प्रिये!
- पुस्तक : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’ रचना-संचयन (पृष्ठ 93)
- संपादक : अजीत मिश्र
- रचनाकार : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
- संस्करण : 2024
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