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मारि देलक महगाइ

mari delak mahgai

बुद्धिनाथ झा

बुद्धिनाथ झा

मारि देलक महगाइ

बुद्धिनाथ झा

और अधिकबुद्धिनाथ झा

    ऊधो, मारि देलक महगाइ॥

    पटल टमाटर झिमनी सजमनि, दाम अकास ठेकाइ

    आलू सोझे सोलह भऽ गेल, राहरिक दालि दवाइ

    साबुन सत्रहसँ नीचा नहि, दामहि मैल छोड़ाइ

    दर भगैए एक-दू बर नहि, ठामहि शून्य दहाइ।

    ऊधो, मारि देलक महगाइ॥

    जीर मरीच तजिपात मसल्ला, हींग अमोल बिकाइ

    अस्सीसँ कम नहि बरु ऊपरे, आद हरदि मेरचाइ

    घी केर स्वाद जीह तर दुर्लभ, दूधक मोल मलाइ

    चाह पीबै छी, छोडू चीनी, पीबू नोन मिलाइ।

    ऊधो, मारि देलक महगाइ॥

    सूँघू सरिसौं तेल नाकसँ, आटा गेल खिसिआइ

    गरी, छोहारा, काजू, किसमिस, सुमिरनमे रहि जाइ

    समतोला, अंगूर, बेदाना, पेटिअहिं जाइ बिलाइ

    दही रूसल कोबरक कनिञा, माँगय मूँह-बजाइ।

    ऊधो, मारि देलक महगाइ॥

    डीजल, पेट्रोल और किरासन ठामहि आगि लगाइ

    पूँजी मूलक विश्व विषमता, तकरे फल दुःखदाइ

    मोन होइए जे भागि जाइ धरि, जायब कतऽ पड़ाइ

    आबहु सब मिलि खेबू नैया, आन उपाय भाइ।

    ऊधो, मारि देलक महगाइ॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : अक्षर निर्क्षर (मैथिली काव्य-संग्रह) (पृष्ठ 105)
    • रचनाकार : बुद्धिनाथ झा
    • प्रकाशन : क्रिएटिव कैम्पस प्रकाशन, हैदराबाद
    • संस्करण : 2015

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