Font by Mehr Nastaliq Web

चंद्र-खिलौना

chandr khilauna

(1)

जा, जा भैया, बार-बार लूँ बलैया तेरी,

मान-मान मेरी मेरे निसि महराजा रे;

राजा राजा दोऊ हिलि—मिलि खेलि केलि करैं,

बिजन डलाऊँ गाऊँ बजै बीन बाजा रे।

बाजा-बाजा तेरी तान ताक-थेई नाचा कान्ह,

छुनुक-छुनुक घुँघुरुन छबि छा जा रे;

छा जा, छा जा अँटा मों उछंग पैठि प्यारे चंद!

बारे ब्रजचंद संग माखन तू खा जा रे।

(2)

नट नटनागर की ताल नाचु भोले भालु,

कान्हा बने केहरि तू धाय मृग-छौना बन;

कानन-विहारी करै गौवन की लीला तब,

हुँकर चुकर वाको बछा मरखौना बन।

साँवरौ सँवारै रूप गुनी तीन लोकवारो,

चमकि-चमकि चारू भाल को डिठौना बन;

बलि-बलि जाऊँ तेरी तन-मन वारूँ तो पै,

जा नेकु चंद, ब्रजचंद को खिलौना बन।

(3)

अरी, री, जुन्हाई मनभाई निठुराई तजै,

मेरो लाल लपकि-लपकि कलपावे ना,

गजब गुजारै, करै गरब कहाँ को कहा—

चंद्रचूर इन चरनन चित्त लावे ना।

खीझि रह्यो मो पै, भली रीझि रह्यो तो पै, मान

मान ले मिताई अनखाई अनखावे ना;

तीनि लोक ठाकुर ठगौरा कर ठगि ठाढ़ो,

तूँ तो भैना! आई, आई अब आवे-आवे ना।

(4)

मचलि-मचलि लाल, लख तो, जुलुम ठाने,

चढ़ती अकास धरि एती निठुरैया तू;

करती कान, कान्ह धूर पै धुरेटो जाय,

सौत की सयानी सुन केती हरजैया तू।

मैया-मैया मोहन पुकारै मेरो प्रान इतै,

तनि निराती उतै हाय दैया-दैया तू।

तीनि लोकवारो बन्यो नन्दघरवारो क्यों न,

एक लोकवारी थार पैठ जा जुन्हैया तू।

स्रोत :
  • पुस्तक : पढ़ीस ग्रंथावली (पृष्ठ 165)
  • संपादक : डॉ. रामविलास शर्मा, युक्तिभद्र दीक्षित
  • रचनाकार : बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
  • प्रकाशन : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
  • संस्करण : 1998

Additional information available

Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

OKAY

About this sher

Close

rare Unpublished content

This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

OKAY