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हड़ताल

haDtal

श्रुति कुशवाहा

और अधिकश्रुति कुशवाहा

    मैं चाहती हूँ

    दुनिया की तमाम स्त्रियाँ

    एक दिन की हड़ताल पर चली जाएँ

    माँएँ छुट्टी लें महानता के पद से

    एक दिन रोते बच्चे को पुरुष के ज़िम्मे छोड़

    अपनी पसंद का उपन्यास पढ़ने बैठ जाएँ

    चार बार उठे बिना चैन से हो खाना

    खाने के बीच साफ़ करनी पड़े बच्चे की पॉटी

    आधी रात बच्चे के रोने से टूटे नींद

    अलसुबह उठना हो दूध पिलाने

    उस एक रात बचपन की सहेली को बुला

    ड्राइंग रूम में सोफ़े पर फैल

    देर रात तक मारे गप्पें

    सारी माँएँ इस दिन बच्ची बन जाएँ

    प्रेमिकाएँ सारे चुंबन स्थगित कर

    अपने बाएँ पैर की छिंगली से

    प्रेमी के अहँकार को परे झटक

    निकल पड़े लॉन्ग ड्राइव पर

    लौटकर बताएँ कि कितना उबाऊ है प्रेमी का लहज़ा

    और प्यार का तरीक़ा बोझिल

    बताएँ कि वो आज भी हैं प्रेमी से बेहतर

    और शहर में अब भी हैं कई ख़ूबसूरत नौजवान

    आज भी है बारिश कितनी रोमांचक

    आज भी है संगीत कितना मोहक

    प्रेम करने के लिए और भी अच्छी चीज़ें हैं दुनिया में

    पत्नियों को तो हड़ताल के लिए

    इतवार ही चुनना होगा

    उस दिन वो सोई रहें देर तक

    और उठकर सबसे पहले

    घर के सामने लगाएँ अपनी नेमप्लेट

    ये उन्हीं का चुना हुआ नाम हो

    जिसे पुकारा जाना सबसे मीठा लगे

    फिर अपने घर में इत्मीनान से पसर चाय पिएँ

    इस वाले इतवार पत्नियाँ पहनें

    अपनी पसंद का रंग

    खाएँ अपने स्वाद का खाना

    टीवी का रिमोट हो उन्हीं के हाथ

    अपनी मर्ज़ी से देखें वो दुनिया

    हड़ताल वाले दिन

    सारी कामकाजी औरतें

    दफ़्तर की लॉबी में बैठ ताश खेलें

    ज़ोर-ज़ोर से करें बातें

    उनके कहकहों से गूंज उठे दफ़्तर

    उनकी मौजूदगी से भर जाए हर कोना

    उस दिन इन्हीं का क़ब्ज़ा हो

    रिसेप्शन, कॉरिडोर, गेस्ट रूम और लिफ़्ट पर

    सारे आदमी सीढ़ियों से चढ़ें-उतरें

    रोज़ उन्हें घूरने वाली नज़रें

    जो बचकर निकलने की कोशिश में हो

    तभी कोई कोकिला गुनगुना उठे

    'हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह

    उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह'

    यूँ शर्म से पानी-पानी आदमी के जूते भीग जाएँ

    दुनिया की तमाम बेटियाँ, सहेलियाँ, सहकर्मी, दोस्त

    दादी नानी चाची मामी बुआ भाभी

    लेस्बियन स्ट्रेट सिंगल कमिटेड

    यह वह ऐसी वैसी अच्छी बुरी

    संज्ञा सर्वनाम क्रिया विशेषण

    जिस दिन ये सब हड़ताल पर जाएँगी

    यक़ीन मानिए

    उस दिन सारे पुरुष

    स्त्री होना सीख जाएँगे

    उसी दिन वो पुरुष से मनुष्य में तब्दील होंगे

    स्रोत :
    • रचनाकार : श्रुति कुशवाहा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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