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कउड़ा : चार गो कविता

kauDa ha chaar go kavita

ब्रजभूषण मिश्र

ब्रजभूषण मिश्र

कउड़ा : चार गो कविता

ब्रजभूषण मिश्र

और अधिकब्रजभूषण मिश्र

    (एक)

    कहावत बाबा कहत रहलें—

    दुअरा पर हाथी बान्ह;

    ना कउड़ा लगाव!

    हाथी बन्हब—

    लोग देखे आई;

    बउसाव ना होखे

    कउड़ा लगाव!

    कउड़ा पर जुटान होई—

    टोला-पड़ोसा के।

    जुटान होई

    दुखड़ा-धनिया होई,

    सुख-दुख के

    बँटवारा होई।

    (दू)

    बाबा के कहल कहावत

    इयाद रखले बाड़ें काका।

    काका बाड़ें

    कउड़ा बा;

    सूखल खर-पात,

    गोबर-करड़ी के

    समेटला के काम

    जारी बा।

    कउड़ा सुनुगावल जात बा।

    कउड़ा बा—

    आग बा,

    आग जियवला के

    सरजाम बा।

    (तीन)

    कउड़ा बा—

    आग बा,

    आग बा—

    लहोक बा,

    लहोक बा—

    धाह बा,

    गरमी बा।

    कउड़ा जरूर लगाव,

    जरूर धनकाव!

    जवना से

    कायम रही आग,

    उठत रही लहोक,

    मिलत रही धाह

    मन अउर मिजाज

    बनल रही गरम।

    (चार)

    कउड़ा बा—

    भुँभुर बा,

    भुँभुर बा—

    उटकेरल जरूरी बा।

    उटकेर!

    उटकेरब

    तितकी मिली।

    एक-आध-

    खर-पतवार डाल!

    फूँक मार लहराव

    लहोक उठी,

    बूझ रहल आग

    जिन्दा हो जाई।

    भरपूर गरमी मिली।

    स्रोत :
    • पुस्तक : खरकत जमीन बजरत आसमान (पृष्ठ 70)
    • रचनाकार : ब्रजभूषण मिश्र
    • प्रकाशन : वनांचल प्रकाशन, तेनुघाट (बोकारो)
    • संस्करण : 2015

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