डर

और अधिककुमार अम्बुज

    आख़िर मेरे पड़ोस में नए समाज की दहशत आती है

    और मुझमें पड़ोस की

    अविश्वसनीय हो जाता है एक प्राचीन विश्वास

    मुस्कुराने पर भी कम नहीं होती आँखों की कठोरता

    इससे पहले कि नरम पड़े कठोरता का छिलका

    एक और भीड़ गुज़र जाती है बग़ल की सड़क से

    तब तक सारे आवरण हट चुके होते हैं

    सब एक-दूसरे को अपने गोपनीय विचारों के साथ दिख रहे होते हैं

    भीतर जो आरी चलती है

    उसकी आवाज़ सुनाई देने लगती है बाहर तक

    सबसे बड़ा डर है कि कोई अपना शत्रु ठीक से नहीं पहचानता

    मैं मारा जा सकता हूँ सिर्फ़ इसलिए

    कि नज़र आऊँ किसी को अपने शत्रु की तरह

    उतना ही मुमकिन है मैं अपने डर की वजह से मार दूँ किसी को

    अभी तक सीखते रहे संभव है लोगों को मित्र बनाया जाना

    मगर सीख रहे हैं अब संभव रह गया है सिर्फ़ शत्रु बनाया जाना

    कई बार तो हम किसी को अपना दोस्त बनाते हुए भी

    उसे किसी दूसरे का दुश्मन बना रहे होते हैं

    ज़्यादा डरने पर करते हैं यही काम सामूहिक तौर पर

    और सोचते हैं इस तरह हम बच जाएँगे

    लेकिन ठीक-ठीक समझ नहीं आता किससे डरें और किससे बचें

    हर आदमी डरा हुआ है इसलिए हर आदमी से ख़तरा है

    सबसे ज़्यादा भयावह है कि कोई स्वीकार नहीं करता अपना डर

    मैं डरता हूँ कि एक डरे हुए निडर समाज में रहता हूँ

    जहाँ नहीं पहचान सकता अपने मित्रों को अपने शत्रुओं को

    बस, देखता हूँ सबके भीतर एक डर है

    जो अपना काम करता है लगातार।

    स्रोत :
    • रचनाकार : कुमार अम्बुज
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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