तीसरी आँख

वियोगिनी ठाकुर

तीसरी आँख

वियोगिनी ठाकुर

और अधिकवियोगिनी ठाकुर

    मेरी तीसरी आँख शिव की नहीं तुम्हारी आँख है

    मैं उसी से देख रही हूँ संसार भर को

    वही जो खुली रह गई थी उस दिन

    जब तुम लेटे थे उस मृत्युशैय्या पर

    तुम्हारी वह आँख मेरी नाक के ठीक ऊपर

    भवों के ठीक बीचों-बीच धँस गई थी उस रोज़

    और तब से मेरा जाग उसी से हुआ है

    मेरी नियति भी तुमसे बहुत विलग नहीं हुई है

    तुम भी अपने आपसे लड़ते रहे और मैं भी

    तुमको अपनों ने छला और मेरे अपराधी भी वही हुए हैं

    हम दोनों ही कितना लड़े—

    हार नामानने की हद तक

    पर जीत कभी नहीं पाए

    जबकि कितना मोह रहा है हममें—

    जीवन के प्रति

    और कैसी विरक्ति भी...

    इतनी कि हम किसी भी पल छोड़ सकते थे संसार

    और भटक सकते थे किसी वन में ख़ुशहाल

    हमने प्रेम किया और जीवन की सबसे गहरी पीर पाई

    हम लड़े—हम उस अभेद्य को भेद बाहर आना चाहते थे

    और देखना चाहते थे इस संसार को फिर से

    किसी नन्ही चिड़िया की आँख-सा

    कितना पुकारा था सबको

    कितनी आवाज़ें दी थीं

    कितना फड़का था लहू उस ज़हर से बचने को

    जीवन के प्रति इतने क्रूर हम कभी नहीं थे

    जितना संसार भर हमारे लिए हुआ

    हम जीवन की चाहना और विश्वास भरे हुए लोग थे

    हमने सबको प्रेम किया, क़ुदरत की हर शय को चाहा

    बेवजह अकारण नि:स्वार्थ

    यह और बात कि

    हमें प्रेम करना कभी नहीं आया

    हमने प्रेम किया और किसी के चरित्र का कीच

    हमारे माथे तक चला आया

    वही माथा जिस पर कभी कोई कालिख लगी

    उस पर दाग़ लगा था

    वही दाग़ जो धोया नहीं जा सका

    वही जिसके लिए धिक्कार है मुझे

    उतना ही रोई हूँ

    जितना तुम रोए हो

    उतनी ही चीख़ें दफ़्न हैं मुझमें

    जितनी तुम्हारे भीतर रही हैं

    पर यक़ीन जानो

    मैं जिऊँगी मेरे दर्द के साथी

    मैं तुम्हारी तरह मरूँगी नहीं!

    देह नहीं छोड़ूगी

    पीड़ा को पोसूँगी और बनाऊँगी उसी को कवच

    जिसने मुझे आवरणहीन किया।

    स्रोत :
    • रचनाकार : वियोगिनी ठाकुर
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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