विश्व-विचार
vishv vichar
चिर स्वर्णिम तारा है—बादलों में कहीं जगमगाता है,
मर्त्य नेत्र ने नहीं देखा, मात्र हृदय उसके लिए ललचाता है।
मात्र हृदय उससे आभासित-विचार चिर, एकाकी है,
आदम-कुल उस तक रक्त से, अश्रु से जाने का आकांक्षी है।
कौन जाने जाने कब जन्मा, संभवतः ठीक उसी क्षण,
भयावह दमक से बंद हुए स्वर्ग-द्वार जिसी क्षण।
और तब से शाश्वतपर्यंत : शतियों ने तारे को सपनाया,
और तब से शाश्वतपर्यंत : बादलों ने तारे को दुबकाया।
सुदूर, धुँधले काल में, हिमालय के मेरु के नीचे,
खोज रहीं तारा स्वर्ग पुरातन की रुदनशील आँखें।
उजाड़ में पुकारा, खोजा उसे हमने रेत पर, धूल पर,
जब हमें डाल दिया विद्याधरों ने प्रकृति-देव बाल11 की अगन पर।
महाराजे जब उन पिरामिडों का खेल कर रहे थे,
जो आज भी गर्वोन्नत खड़े ज्यों रक्त से चिने थे।
आज भी चकित हैं लोग उन विस्मयों को देखकर,
पोथियाँ लिखते फराओनों के वैभव पर!
ओ गेथ्सेमानी12 पवित्र उद्यान, ओ कैद्रोन23 के पवित्र जल,
बता दो मुझे कहाँ अंतरिक्ष के तारे का रहस्य वह?
आप ही से गिरे अश्रु दो सत्यनिष्ठ नेत्रों पर,
लक्षित मानवता की समस्त दीनता उन पर।
पी गई काली धरती उन्हें पी गया सागर प्यासा,
बाल-सुलभ बातों को शेष रही रिक्त कथा!
चिर अश्रु था जो— बस उसे उधार मिला,
मानव-पीड़ा की सदियों से नेत्र में छिपा रहा।
हाथ उठे उसके पीछे, वे आँखें भी दर्द भर,
आक्रोपोलिस34 के चरणों में कैपटोल45 की डगर पर,
प्राचीर के धुएँ में पुकारा उसे नाम से,
शिरछेद अस्त के नीचे खोजा शुभ्र दृष्टि ने...
...झूठे हैं आदर्श, अथवा काल का कथन झूठा;
कौन खोज लेगा तारा हमारी समाधि के इस ओर?
- पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 1)
- रचनाकार : सिल्विए स्त्राहीमीर क्राञ्चैविच
- प्रकाशन : ज़ाग्रेब, नई दिल्ली
- संस्करण : 1978
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