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एक सौ एक डिग्री12
3पर्वतीय ढलान
गुफ़ा में अस्पताल
सूखी पत्तियों का बिछौना
बुखार!
होने दो, डॉक्टर! वैसे भी हड्डियों में घुसी
सर्दी के मारे कितने तो दाँत किटकिटाए मैंने।
एक सौ एक डिग्री! ...
मुझे कुछ भय नहीं। जीवन में इससे भी कड़े ताप
सहे हैं मैंने, जब मेरी नसों में युवा रक्त गूँजता था,
मेरे हृदय में गीत चीख़ते थे। मैं गोधिका-सा
था : आग में रहता, अंगारों से पेट भरता; मेरी
जिह्वा भी लपटमय थी। सारा एक संसार उससे
भस्म हो सकता था... अब, मैं अपनी वही जिह्वा
चाहता हूँ, क्योंकि समय आ गया है जब आग
फेंकी जाती है बहुत-से जमे पानियों पर, बहुत-से
सड़े तनों पर, बदबूदार कूड़े के ढेरों पर।
गुफ़ा में हैं हम लोग।
कहते हैं कि नीची है, नम है, कालोंच से भरी है।
हुँ, बकवास!... मुझे दीख रही है, ऊँची है,
चौड़ी है गुफ़ा-सी जिसमें भेड़ों की रखवाली
करता था दैव पोलीफ़ैम —जानते हो न, वही
होमर का दैव-ओडिसि ने अकेली आँख
फोड़कर जिसे अंधा कर दिया था। —डॉक्टर,
मेरी आँख बचा लो! चमत्कारी, रहस्यमयी आँख
को जिसने बहुत पहले ही सब देख लिया था—
भविष्यवक्ता की भाँति, वेताल की भाँति —जो आज
घट रहा है।
अस्पताल —गुफ़ा में, स्वतंत्रता-संग्राम के योद्धाओं
का। नहीं! पर्वतीय मंदिर है ये ऊँची महराबवाला
संगमरमरी स्तंभोंवाला, जिनमें सुरक्षित है अग्नि
जो कभी बुझती नहीं।
तुम मेरी बीमारी नहीं जानते; मेरे लिए बेहतर
बिस्तर खोजते हो, और वह है फूस और
सूखी पत्तियों का बिछौना, मेरी थकी हड्डियों के लिए,
ऊँचा और मुलायम, सैकड़ों भेड़ों की ऊन के गद्दे-सा।
डॉक्टर, जलने दो मुझे, यहीं, इस गुफ़ा में! अकेला छोड़
दो मुझे, झेल लेने दो आग मुझे, कि जिसके बिना
शीत मेरा हृदय काट देता; सो लूँ गुफ़ा में, जिसे न
जाने कब से पहचानता हूँ
लेटा रहने दो मुझे सूखी पत्तियों के बिछौने पर, मुझे
तो कोमल लग रहा है, मैदान में चर रहे मेमनों के
बालों-सा!
और कल जब उठूँगा और प्रसन्नचित्त गुफ़ा के द्वार
तक पहुँच जाऊँगा, अपने दमकते आवरण से सूरज
मुझे ढक लेगा!
- पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 22)
- रचनाकार : व्लादीमीर नाज़ोर
- प्रकाशन : ज़ाग्रेब, नई दिल्ली
- संस्करण : 1978
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