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चिङ्कानशान का दूसरा आरोहण

chinkanshan ka dusra arohan

अनुवाद : सुरेश सलिल

माओ ज़ेडॉन्ग

माओ ज़ेडॉन्ग

चिङ्कानशान का दूसरा आरोहण

माओ ज़ेडॉन्ग

और अधिकमाओ ज़ेडॉन्ग

    बहुत पहले सपना सँजोया था मैंने

    बादलों की ऊँचाई छूने का;

    और आज फिर नाप रहा हूँ

    चिङकानशान की ऊँचाई।

    अपनी पनाहगाह का जायज़ा लेने के लिए

    लंबी दूरी तय करते हुए

    नए नज़ारों को मैंने पाया पुरानों को बेदख़ल करते।

    हर कहीं देखा पीलक परिंदों को गाते-चहचहाते

    अबाबीलों को तीर के माफ़िक उड़ते

    चश्मों को कलकल बहते

    और राह को आसमान की ओर

    ऊपर उठते मैंने देखा।

    एक बार हुआङचेह अगर हो जाए पार

    तो, समझ लो, मुश्किलों ने मान ली है हार।

    जिस जगह भी आदमी है; या कि आदमज़ात

    मचलती है वहाँ बिजली—मचलता तूफ़ान,

    फहरते हैं वहाँ झंडे और परचम।

    गुज़र गए ये अड़तीस बरस ऐसे

    कि जैसे, बस्स्—

    चुटकी बजाई हो।

    सच्चाई यह है कि हम

    पाँच समंदरों की गहराई में उतरकर

    झुंड के झुंड कछुए पकड़ ला सकते हैं :

    वापस होंगे हम जीत के गीत गाते

    ठहाके लगाते।

    कुछ भी नहीं मुश्किल इस दुनिया में;

    ‘क़दम ख़ुद-ब-ख़ुद बढ़के चूमेगी मंज़िल

    अगर तुममें बढ़ने का साहस भरा है।’

    स्रोत :
    • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 122)
    • रचनाकार : माओ ज़ेडॉन्ग
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2003

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