खाड़ी के चाँदी से चमकते पानी में
उड़ेल देती है करोनी असंतोष के आँसू
छोड़ दिया गया था जिन्हें वर्षों तक सड़ने के लिए
वर्षों तक राज किया रेड हाउस1 ने गाँवों पर
और परवाह नहीं थी कोई व्हाइटहॉल2 को
जिसके बूट रौंद डालते थे गन्ना हर फ़सल पर,
फिर सुनहरे तीरों के बीच चमक उठा एक फ़ौलादी प्रकाश;
चाँदी-सी चमकती थी उसकी किरणें
उम्मीद की, देखभाल की, प्रेम की
और गोस्पेल, क़ुरआन, गीता और रामायण
प्रार्थना कर रहे थे इन मसीही दिनों के अंत के लिए
हो रही थी राख जब धीमे से जलती वह मीनार
और तब सूर्य पुराना फिर छुप गया अपनी किरणों के साथ
II
करोनी के बच्चों ने अपनाए
(दीवाली और गीतांजलि के बीच)
सूर्य के आहवान के सभी तरीक़े,
और चंद पलों के लिए उन जीवंत तास्सा ढोलों ने
गुँजा दिया आसमान फ़ौलादी ढम-ढम से
फगवा, होसे3 और दिमांच ग्रा4 के मौक़े पर
साफ़ कर दी थी बरखा ने सब धूल पहाड़ों की;
और खिंच गया एक सुनहरा पथ दिगंत तक
बना मेहराबी उस मेहराब से
फैली हुई थी जो हरे विस्तार में
इकाकोस5 और गालेओता6 के बीच;
और घंटियों, अज़ानों और शंखनाद से
लगता था कि सब कुछ ठीक है
धन्य इन द्वीपों पर।
III
बाढ़ के रोष ने भर दिया गाद से
समंदर के भूरे तटों को;
अपने बच्चों की उभरी नसों से
गुज़रता है करोनी का गहरा ठहरा पानी
एक बुदबुदाती लाली को भीतर समेटे;
फैलते जाते हैं प्रवासी
दूर प्रायद्वीपों पर दूर उन गड़े धागों से
केवल वही हैं जो जोड़ सकते हैं
इस जड़ों से उखपड़े व्यक्तित्व को
एक ऐसी जगह और समय से
जो बेमानी कर देता है
गंगा माई के पास लौटने के स्वप्न को;
बह रही है करोनी शांत खाड़ी की ओर,
दूर उस तरफ़ तैयार है सूर्य फिर उगने को
स्वप्न एक और, स्वर्गनुमा द्वीप का।
- पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 95)
- संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
- संस्करण : 2006
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.