एक शहर था

और अधिकजितेंद्र कुमार

    उस शहर में

    नदी किनारे के एक मकान में

    हम रहते थे

    वह उस झील में जाकर गिरती थी

    जो सूरज के बदलते रंगों में

    पहाड़ी का दुख

    अपने अंदर लपेटे

    वहाँ लेटी थी

    जब हवा चली

    झील की सतह पर चाँदनी

    एक फ़ोटोग्राफ़ का-सा दृश्य रचती

    बिखर गई

    उस शहर में जीवन सहज था

    गँवारू ओछेपन के बावजूद

    उसके लोग सहज थे

    हालाँकि हमारे तन पर

    चिथड़ों के अलावा और कुछ नहीं था

    मैं, मेरी पत्नी और हमारा बेटा

    उस शहर में प्रतिष्ठित थे

    वहाँ हमने कुछ दोस्तियाँ कीं

    फिर उनके मुँह पर दरवाज़ा बंद कर

    खिसक लिए

    मेरी बीवी

    ख़ूबसूरत, मिलनसार और ख़ुशमिज़ाज थी

    पर मेरी वजह से

    वह अपने उस खोल में सिमट गई थी

    जो अंडे के छिलके से भी पतला

    मगर ओपेक था

    रफ़्ता रफ़्ता

    मेरी बीवी ने पेट में कीड़े पाल लिए

    और मैंने सिफ़लिस

    दो साल बाद हम पलटकर

    उस शहर में आए थे

    और उस मकान में रहने लगे थे

    जो नदी के किनारे था

    पानी में डूब मरने की दहशत लिए

    मेरा लड़का

    उसके पानी को ताकता खड़ा रहता

    कभी-कभी आँख बचाकर

    वह उसमें पत्थर फेंकता

    और पकड़े जाने पर कहता

    वह कितनी अच्छी मज़ेदार

    गुड़ुम आवाज़ करता है

    वह इस क़दर छोटा था

    कि दो फ़ुट गहरे पानी में भी

    डूब कर मर सकता था

    आख़िरकार मैं अपने इस ऑब्सेशन से

    ऊब गया

    मैंने एक खिचड़ी दाढ़ी बढ़ा ली

    मेरी बीवी ने

    एक औरत से दोस्ती कर ली

    जो एक शाम

    व्यर्थ ही मेरा इंतज़ार करती रही

    कि मैं उसे जाकर घर ले आऊँगा

    एक शहर था

    और उसमें

    नदी किनारे के मकान में हम रहते थे।

    स्रोत :
    • पुस्तक : आईने में चेहरा (पृष्ठ 38)
    • रचनाकार : जितेंद्र कुमार
    • प्रकाशन : जयश्री प्रकाशन
    • संस्करण : 1980

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