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परिवर्तनमयता

parivartanamayta

अनुवाद : यतेन्द्र कुमार

पर्सी बिश शेली

पर्सी बिश शेली

परिवर्तनमयता

पर्सी बिश शेली

और अधिकपर्सी बिश शेली

    (1)

    झूमे हैं ये बादल निशीथ के, जिनसे ढँक जाता है शशधर,

    जो कितने अशांत होकर के, चलते, चमके, कंपित होते!

    भरते ज्योति-शिराओं से निज तम को, तो भी रजनी सत्वर,

    घिरती चारों ओर, और वे अपने को हैं चिर को खोते।

    (2)

    या हम वे विस्तृत वीणा हैं, जिनके उलझे हुए तार से,

    हर परिवर्तित वायु कंप से, निःसृत होते हैं अनेक स्वर,

    जिसकी कृशकाया लाती है नहीं दूसरे गति-प्रहार से,

    एक भाव, अथवा दुहराती नहीं विगत संगीत लहर पर।

    (3)

    हम सोते तो-स्वप्न हमारा कर सकता है शयन गरलमय,

    जो जगते तो-भ्रांत भाव ही दिन को कलुषपूर्ण कर सकते!

    सोचें, समझें, तर्क करें, या हँसें, करें हम नयन अश्रुमय,

    प्रिय दुख का करते आलिंगन, या चिंताएँ दूर त्यागते!

    (4)

    यह सब बात एक ही सी है, सुख ही हो विषाद हो अथवा,

    अब भी बाधाहीन पड़ा है! इसके जाने का है रस्ता!

    हो भी नहीं मनुज का बीता-कल उसके भावी कल जैसा,

    क्योंकि सभी कुछ अस्थिर जग में थिर तो बस परिवर्तनमयता!

    स्रोत :
    • पुस्तक : शेली (पृष्ठ 39)
    • संपादक : यतेन्द्र कुमार
    • रचनाकार : पर्सी बिश शेली
    • प्रकाशन : भारत प्रकाशन मंदिर, अलीगढ़

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