बस इतना हो
bus itna ho
गोलाई खोती पहिए-सी ज़िंदगी में
सपने और चपटे होते जा रहे हैं
शेष बची प्रार्थनाएँ ही
इस पत्थर-समय की छेनी है
जिससे लिखा गया
बस इतना हो
कि ग़रीबों की हत्या का नाम
आत्महत्या न पड़ जाए
बस इतना हो—
‘समय पर दो बार कम से कम
बिजली आए न आए,
पानी ज़रूर आ जाए ‘
बस इतना हो
उम्मीद और उत्सुकता भरी आँखों में
चमक के पीछे उदासी की रहनवारी न हो
और बस इतना हो
कि सपनों को पाने के लिए
जुगनुओं को न बेचना पड़े
और कोई पंगत में
बिना पत्तल के बैठा न रह जाए।
- रचनाकार : यतीश कुमार
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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