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अबका होई भाय गोबरधन

abka hoi bhaay gobardhan

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

अबका होई भाय गोबरधन

आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

और अधिकआद्या प्रसाद 'उन्मत्त'

    लोकतत्र का पहिया धँसिगा अनाचार की कीच,

    सत्त नियाव भोंकड़ि के रोवैं भरी भीड़ के बीच,

    केउ ना कहूँ पुछतर केउ कै मनई अस बौरान

    मजहब की दुकान कै पुड़िया बनिगे वेद पुरान।

    अल्ला मियाँ के घर मा मुल्ला लूंकी रहे लगाय,

    अबका होई भाय गोबरधन अबका होई भाय।

    दिल्ली की बड़की कोठी से झुग्गी बोली रोय,

    तू खजूर हम भुइका तिनका केहि विधि मिलना होय,

    हाथे फरुहा मूड़े पलरी सपन भये सब चूर,

    दिल्ली कै किल्ली हाथे मा तब्बौ दिल्ली दूर।

    पीर पराई का जानइ, ना जेकरे फाटि बेवाय,

    अबका होई भाय गोबरधन अबका होई भाय।

    राम रमौझा दुआ बंदगी भइ गदहा कै सींग,

    अपनप्पन कै बात कतहूँ सगरौ धींगाधींग,

    आपस का बिसुवास टूटिगा अकिल होइ रही गुम

    असि के टेढ़ भवा मनई जस कुकरे कै दुम।

    भइँस के आगे बीन बजावै भइंस खड़ी पगुराय,

    अबका होई भाय गोबरधन अबका होई भाय।

    मुह देखी कै लाग कचेहरी भटकै सत्त नियाव,

    मिट्ठू मियाँ बनि गवा कौआ हँसा बोलै काँव,

    जहाँ जुलुम कै आगि बरसी धुआँ गूँजा होय

    उड़ि चल सुगना ओहि नगरी मा कहै सुगनिया रोय।

    छानी चढ़ी कुकुरिया कानी, बछिया मारी जाय,

    अबका होई भाय गोबरधन अबका होई भाय।

    स्रोत :
    • पुस्तक : माटी औ महतारी (पृष्ठ 34)
    • रचनाकार : आद्या प्रसाद 'उन्मत्त'
    • प्रकाशन : अवधी अकादमी

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