अज्ञात चित्रकार की आँख में बसना
agyat chitrkar ki ankh mein basna
ख़रीदिए चित्र
चित्र है अज्ञात चित्रकार का
ख़रीदिए चित्र अज्ञात चित्रकार का
चित्र एकदम काला
सर्वत्र एक-सा काला है
ऊपर भी नीचे भी बाएँ भी दाएँ भी विशेषकर
बीच में और विशेषकर किनारे पर
सर्वत्र एक-सा काला है
सबसे काला है उस जगह जहाँ अभी देख रहे हैं आप
ख़रीदिए चित्र अज्ञात चित्रकार का अज्ञात
शताब्दी के अज्ञात प्रदेश के अज्ञात चित्रकार-वर्ग के
जो अज्ञात विधि से अज्ञात पदार्थों से बनाया गया
ख़रीदिए यह काला चित्र
सेंध लगाइए काले चौखटे में और घुस जाइए उसके अंधकार में
बेधड़क घुस जाइए उस अपूर्व नीरवता में, उस सींग में
और वहाँ
कपड़े उतारिए आराम से, एकदम, नंगे हो जाइए
यहाँ उस काले चित्र में
उस अँधेर नीरवता में
पहुँच जाएँगे आप
सहज ही और बिना दर्द के
फ़राओनों की तरह
उस तक जो ही मात्र चिर है पहुँच जाएँगे यों शाश्वत में
ख़रीदिए चित्र
यह काला चित्र अज्ञात चित्रकार का
जब उसके अँधेरे से यों नंगे निहारेंगे
गरजते हरे मैदान को और बासे नीले डूबे हुए भूरे
नगरों को रंग-बिरंगी प्लास्टिकी औरतों को, बर्तनों को उपकरणों को,
अंधा कर देने वाले चमकते वायुयानों को, बादामी झूलते
खेतों को
जब सब निहार चुकेंगे
पाएँगे कि सारी दुनिया
सस्ता रूपांतर है ज़बरदस्ती घोली गई बिखेरी गई कालोंच का
ख़रीदिए यह मौन चित्र
चित्र पैदा हुआ काली आँख में अज्ञात चित्रकार की।
- पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 180)
- संपादक : श्यौराजसिंह जैन
- रचनाकार : अलोयज़ मायेतिच
- प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
- संस्करण : 1978
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