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उपहास बनल छी

uphaas banal chhi

सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

और अधिकसुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

    संसार भरिक लोककेर उपहास बनल छी,

    पशुओ ने मुँह लगा सकय निघास बनल छी

    स्नेहक बढ़ौलहुँ हाथ तँ चट बज्र खसि पड़ल,

    फूटल छै भाग जकरे से हताश बनल छी

    यारी ने निबहि सकल क्षणक रौद-पानिमे,

    निर्जन मसान बीच दुखक रास बनल छी

    सपनो ने सुखक भान हमर त्राण अछि कतऽ,

    बेलो-बबूर उगि ने सकय चास बनल छी

    जाइत अछि पूछल समयपर आक धथूर,

    फूलोमे फूल अधम अमलतास बनल छी

    हमरा ने टोकय लोक, अपन नीक जँ चाहय,

    भारी अलच्छ खापड़ि अशुभ त्रास बनल छी

    स्रोत :
    • पुस्तक : गजल ओ गीत
    • रचनाकार : शेखर प्रकाशन, पटना
    • प्रकाशन : सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी
    • संस्करण : 1991

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