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मुफ़लिसों की बस्तियों में ये नज़ारा आम है

mufalison ki bastiyon mein ye nazara aam hai

मनजीत भोला

मनजीत भोला

मुफ़लिसों की बस्तियों में ये नज़ारा आम है

मनजीत भोला

और अधिकमनजीत भोला

    मुफ़लिसों की बस्तियों में ये नज़ारा आम है

    धूप को दिन खा गया है बेचरागाँ शाम है

    तप रहा था गात फिर भी जा चुकी है काम पर

    कह रही थी चाँदनी कुछ आज तो आराम है

    ये दिया है वो दिया है रोटियाँ पर हैं कहाँ

    घोषणा सरकार की हमको करे बदनाम है

    चाय जाकर वो पिए है रोज़ लेबर चौक पर

    क्या पता मज़दूर को किस दूध का क्या दाम है

    गेट के भीतर नहीं जो जा सके इस्कूल के

    आपकी हर योजना उनके लिए बेकाम है

    इक कलम औ' कुछ किताबें दे नहीं सकते अगर

    झोंपडी पे क्यों लिखा अम्बेडकर का नाम है

    मज़हबी है ये शहर अब जी यहाँ लगता नहीं

    है छुरी पहलू में उसके, मुँह में जिसके राम है

    स्रोत :
    • रचनाकार : मनजीत भोला
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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