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तुम्‍हें मीर के एक मिसरे से छू लूँ

tum‍hen meer ke ek misre se chhu loon

ओम निश्चल

ओम निश्चल

तुम्‍हें मीर के एक मिसरे से छू लूँ

ओम निश्चल

और अधिकओम निश्चल

    अभी नींद में हो

    परी लग रही हो

    सपनों में कितनी हँसी लग रही हो

    करता है जी मैं तुम्हें थपथपाऊँ

    तुम्हें साथ अपने बग़ल में सुलाऊँ।

    सुला कर मधुर गीत अपने सुनाऊँ।

    तुम्हारा धुलूँ स्निग्ध चेहरा सुबह मैं

    ये गेसू तुम्हारे संवारूँ कभी मैं

    कभी चूम लूँ माथ गोरा तुम्हारा

    कभी मैं डिठौना लगा दूँ दुलारा

    कभी तुम दुबक जाओ सीने में प्रिय के

    सुनो चुपके-चुपके प्रणय-गीत हिय के

    तुम्हें मीत जीवन का अपने बनाऊँ।

    तुम्हें मैं मधुर गीत अपने सुनाऊँ।

    टेसू से होठों को पलकों से छू लूँ

    पलकों को होंठों की धड़कन से छू लूँ

    सुनाऊँ ग़ज़ल कोई ग़ालिब की तुमको

    तुम्हें मीर के एक मिसरे से छू लूँ

    तुम्हें ले चलूँ कल्पना के भुवन में

    भावों की कोमल धरा पर बिठाऊँ।

    कभी साँस फूँको जगाओ मुझे तुम

    कभी पास गुनगुनाओ मुझे तुम

    कभी मंत्रमुग्धा बनी तुम रिझाओ

    कभी मैं जो रूठूँ मनाओ मुझे तुम

    तुम्हारी हँसी पर निछावर हँसी हो

    तुम्हारे मगन मन पे मैं रीझ जाऊँ।

    कभी पंखुरी-सी यह पलकें तो खोलो

    कभी तो मधुर बोल मुझसे भी बोलो

    हमेशा आँसू में डूबी रहो तुम

    कभी मेरी सद्भावना भी तो तोलो

    चलो उड़ चलें इस धरा से गगन में

    वही कोई कुटिया-सी अपनी छवाऊँ।

    कहीं कोई नदिया समंदर हो कोई

    किनारे हो तुम जैसे अपने में खोई

    तुम्हारे भी भीतर नदी बह रही हो

    बहाती हुई-सी मुझे चल रही हो

    चलो ले चलूँ मैं तुम्हें साथ अपने

    बिठाकर के पलकों पे सपने सजाऊँ।

    स्रोत :
    • रचनाकार : ओम निश्चल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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