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कन्हैया तोहै दुशासन कलयुग में ललकारत बाटै

kanhaiya tohai dushasan kalyug mein lalkarat batai

रामजियावान दास ‘बावला’

रामजियावान दास ‘बावला’

कन्हैया तोहै दुशासन कलयुग में ललकारत बाटै

रामजियावान दास ‘बावला’

और अधिकरामजियावान दास ‘बावला’

    कन्हैया तोहै दुशासन कलयुग में ललकारत बाटै।

    पुनि-पुनि शान बघारत बाटै ताव से गरदन झारत बाटै ना॥

    लागत बा फिर करी उधारी। खींची द्रुपद सुता कै सारी।

    नारी बा सशंकित पकड़ के आँचर फारत बाटै टेंढ़ी नजर निहारत बाटै

    ताव से गरदन झारत बाटै ना॥

    थथमल ग्वाल बाल टोली। आये दिना जरत बा होली।

    डोली धरा बुझाला शिष्टाचार नदारत बाटै पानी बनल बिगारत बाटै

    ताव से गरदन झारत बाटै ना॥

    गोकुल मथुरा प्रयाग काशी। सगरी छवले बाय उदासी।

    नासी प्रकति संपदा दुर्योधन जिब जारब बाटै गाँछी लगल कबारत बाटै

    ताव से गरदन झारत बाटै ना॥

    सिहरल बा कदम्ब कै डाली। सूखत वृन्दावन हरियाली।

    खाली हाथ सुदामा के दुर्दिन दुतकारत बाटै तेल आग में डारत बाटै

    ताव से गरदन झारत बाटै ना॥

    गइयन के लेई जात कसाई। मोरवा जइहै कतौं पराई।

    भाई हलधर जी के चिक्का चला के मारत बाटै नक्सलवाद उभारत बाटै

    ताव से गरदन झारत बाटै ना॥

    आवा चक्र सुदर्शन धारी। पसरत नई नई बिमारी।

    भारी विपति 'बावला' जन समूह संहारत बाटै अटपट बात उचारत बाटै

    ताव से गरदन झारत बाटै ना॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : गीत मंजरी
    • संपादक : हरिराम द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
    • रचनाकार : रामजियावान दास ‘बावला’
    • प्रकाशन : सर्व भाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2021

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