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घनश्याम जेना अगुतायल अछि

ghanshyam jena agutayal achhi

मायानंद मिश्र

मायानंद मिश्र

घनश्याम जेना अगुतायल अछि

मायानंद मिश्र

और अधिकमायानंद मिश्र

    घनश्याम जेना अगुतायल अछि।

    आङी हरियर पहीरि धरणि जनि

    आँचरसँ उधिआयल अछि।

    भीजल कदमक ठाढ़िक चुम्बन

    हित पुरिबा ललचायल,

    धरणि-नयन केर रंग जेना

    नब कनिया सन अलसायल

    पहिल अषाढ़क पहिले अनुभव

    सँ जनु दूभि डेरायल अछि।

    दूबरि पातरि सरिता केर

    तनमे, यौवन उमड़ल अछि

    आइ अचानक मोन दुकूलक

    कसकल अछि, मसकल अछि

    श्यामक बरजोरीमे तट-राधा

    केर, मन भसियायल अछि।

    खतक आँचररमे शस्यक अछि

    छन्द के इतिहासल

    धरती केर जीवन-वंशीमे

    रागक बाजत पायल,

    बाधक मन जनु चासक गीतेसँ

    एहिखन हरिआयल अछि।

    खरिहानक मन उमगल देखल

    आँगन हुलसल, फुलसल

    चुल्हाकेँ बिहुँसल देखल तँ

    चिनमारी अछि चमकल,

    आँगन केर तुलसी एखनहिसँ

    अरिपन हित ललचायल अछि।

    घनश्याम जेना अगुतायल अछि।

    स्रोत :
    • पुस्तक : अवान्तर (पृष्ठ 43)
    • रचनाकार : मायानन्द मिश्र
    • प्रकाशन : मैथिली चेतना परिषद्, सहरसा
    • संस्करण : 1977

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