मिथिलांचल में एक गाँव था। उस गाँव में दो भाई रहते थे। एक का नाम था सोमारू और दूसरे का नाम था मंगरू। दोनों में बहुत प्यार था और आपसी तालमेल भी बहुत था। दोनों एक साथ ही खाते-पीते थे और रहते थे। दोनों भाइयों ने एक बार आपस में विचार-विमर्श किया कि क्यों न हम लोग देश-परदेश घूमने के लिए निकलें। ऐसा ही विचार कर दोनों ने घोड़ा तैयार किया, ज़रूरी साज-सामान रखा और दूसरे दिन सुबह निकलने की तैयारी कर ली।
अगले दिन सुबह-सुबह ही घोड़े पर सवार होकर दोनों भाई चल दिए देशाटन को। जाते-जाते दोनों जब थक जाते तो रास्ते में किसी छायादार वृक्ष की छाया में एक किनारे घोड़ा बाँधकर और दूसरे किनारे गमछी बिछाकर विश्राम कर लेते। भोजन के लिए जो सत्तू और अन्य ठेकुआ-पुआ-भुंजा आदि लेकर चले थे, उसी से गुज़ारा कर लेते थे। साँझ होते ही वैसे ही किसी छायादार वृक्ष के नीचे रात गुज़ार लेते थे। ऐसे ही कुछ दिन चलता रहा।
एक दिन दोनों भाई संध्याकाल एक पीपल के पेड़ के नीचे अपना आश्रय बनाया। खा-पीकर दोनों भाई सो गए। घोड़ा तो दूसरी तरफ़ बाँध ही दिया था।
उसी पीपल के एक खोहड़ में नाग-नागिन वास करते थे। नाग ने जैसे ही पीपल गाछ के नीचे दो मुसाफ़िर को आराम करते देखा तो उसका मन चटपटाने लगा। वह उनको डस कर अपना विष उतारना चाहता था। लेकिन नागिन दयालु स्वभाव की थी। वह नहीं चाहती थी कि नाग उन्हें डसे। इसलिए नाग बड़ी देर तक धैर्य धारण कर और मन मारकर चुपचाप मौक़े की तलाश में था। जब उसने देखा कि नागिन सो गई, तब वह धीरे-धीरे ससर कर आया और सोमारू को डस लिया। इसके बाद वह वैसे ही चुपके से नागिन के पास सो गया, जैसे उसने कुछ किया ही नहीं। सवेरा होते ही मंगरू उठा। जब वह सोमारू को जगाने लगा तब उसने देखा कि उसकी साँस रुकी पड़ी है और उसके मुँह से झाग निकल रहा है। उसे यह समझते देर नहीं लगी कि किसी कीड़े-मकोड़े ने इसे डस लिया और सोमारू अब मृत्यु को प्राप्त हो गया है।
सोमारू के मृत जान पड़ते ही मंगरू रोने लगा। उसे कुछ सूझ नहीं रहा था कि वह अब क्या करे। अचानक उसे अपने भाई के क्रिया-कर्म का ध्यान आया। उसने सोचा कि निकट के ही किसी शहर में जाकर घोड़ा बेचने से जो पैसा मिलेगा, उसी से भाई का क्रिया-कर्म कर दूँगा। ऐसा सोचकर मंगरू नगर की ओर चल दिया।
मंगरू ने अपने भाई की मृत्यु का दुख कई लोगों के साथ बाँटना चाहा पर सहायता करना तो दूर सहानुभूति के दो बोल भी कोई न बोल सका। कोई उसका घोड़ा भी ख़रीदने को तैयार न था। अंत में एक बड़े-से घर, जो कि बहुत धनवान व्यक्ति का लग रहा था, के दरवाज़े पर आवाज़ लगाकर मालिक तक पहुँचा। उसने अपना सारा हाल कह सुनाया। मंगरू को ऐसा लगा कि यह धनवान व्यक्ति मेरा घोड़ा ख़रीद लेगा।
पर वह धनवान व्यक्ति तो आले दर्जे का धूर्त और कपटी निकला। वह समझ गया कि इस शहर में यह नया व्यक्ति है और यह मेरा क्या बिगाड़ लेगा? उसने छल से घोड़ा बाँध लिया और मंगरू को भी बंधक बना लिया। दिन-रात उससे काम लेता और खाने-पीने को भी जैसे-तैसे देता था। हमेशा उसकी निगरानी करता रहता था कि वह कहीं भाग न जाए। मंगरू अब फँस चुका था।
इधर सोमारू का मृत शरीर दिनभर उसी गाछ के नीचे वैसे ही पड़ा रहा। नागिन ने जब मृत शरीर को देखा तो नाग को बहुत फटकार लगाई कि निरपराध बटोही को क्यों डस लिया? पर अब तो कुछ हो नहीं सकता है।
संयोग की बात है कि विधि-विधाता दोनों मृत्युलोक की सैर पर निकले थे और रात्रि विश्राम के लिए उसी गाछ पर रुके थे जिसके नीचे सोमारू का मृत शरीर पड़ा था। विधि की नज़र अचानक नीचे ज़मीन पर पड़ी तो सोमारू के उस मृत शरीर पर भी नज़र पड़ जाना स्वाभाविक ही था। सुंदर काया देखकर विधि को दया आ गई। उन्होंने विधाता से कहा, “देखिए स्वामी! यह कोई सुंदर युवक है और न जाने किस कारण से इसने अपनी जान गँवा दी है। इसके परिवार के लोग चिंतित होंगे। इसलिए कोई उपाय कर इसे जीवित कर दीजिए।”
विधाता ने विधि से कहा, “देखिए विधि, यह मृत्युलोक है। इस लोक में लोग जन्म लेते हैं और मरते हैं। आप यदि सबको जीवित करने लगेंगे तो मृत्युलोक का नियम ही ख़त्म हो जाएगा।”
फिर भी विधि बार-बार विधाता से उस नवयुवक अर्थात सोमारू को जीवित करने का आग्रह करने लगीं। विधि द्वारा बार-बार आग्रह-निवेदन के पश्चात विधाता को उनकी बात माननी पड़ी। उन्होंने कुछ ऐसा चक्र चलाया कि नाग को जाकर सोमारू के शरीर से विष निकालने को बाध्य होना पड़ा। इसके बाद सोमारू जीवित हो गया। वह सवेरा होने का इंतज़ार करने लगा।
उधर सोमारू को जीवित देख विधि-विधाता उस गाछ से उड़कर आगे बढ़ चले।
सोमारू को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि उसका भाई मंगरू यहाँ नहीं है। उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। उजाला होते ही वह अपने घोड़े पर सवार होकर अपने भाई मंगरू की खोज में निकल पड़ा। इधर-उधर बहुत ढूँढ़ा पर मंगरू का कोई थाह-पता नहीं लग रहा था। चलते-चलते शाम हो गई थी। यदि रात हो गई तो और मुसीबत हो जाएगी। यही सोचकर सामने एक घर दिखा, उसने सोचा यहीं रुका जाए। उस घर के बाहर एक बुढ़िया दिखी। सोमारू ने उस बुढ़िया से कहा, “मैं तो परदेसी हूँ। यहाँ एक रात ठहरने की जगह मिलेगी क्या?” बुढ़िया ने उसका हृदय से स्वागत किया। उसके थोड़ी देर बाद ही बुढ़िया रोने-गाने लगी।
बुढ़िया को कभी रोते और कभी हँसते देख सोमारू अवाक् रह गया। उसे ऐसा लग रहा था कि बुढ़िया कहीं पागल तो नहीं है। सोमारू को कुछ समझ नहीं आ रहा था। इसलिए उसने बुढ़िया से पूछा, “माताजी! अभी तो आप मेरे साथ हँस-हँस के बात कर रही थीं, फिर तुरंत रोने लगीं? आख़िर क्या बात है? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है।
बुढ़िया ने सोमारू को बताया, “बेटा! मेरे लिए यह बड़ी ख़ुशी की बात है कि एक व्यवहार-कुशल और सुंदर युवक मेरे घर अतिथि के रूप में पधारा है। इसलिए बहुत ख़ुश हूँ। पर दुख की बात यह है कि मेरा एक ही बेटा है। उसका द्विरागमन का दिन निश्चित है। पर दुर्भाग्य की बात है कि इस नगर की राजकुमारी पता नहीं राक्षसी है कि दैत्य है, उसे रोज़ एक नवयुवक भक्षण के लिए चाहिए और कल मेरे बेटे की बारी है। इसलिए पुत्र वियोग में मैं रो भी रही हूँ।”
सोमारू ने धीरे-धीरे उससे सारी बातें खोद-खोदकर पूछी और सब कुछ समझ लिया। बुढ़िया ने उसे यह भी बताया कि इस राज्य का जो राजा है उसकी एक इकलौती बेटी है। बहुत ही सुंदर है राजकुमारी। पर पता नहीं क्या रहस्य है? जिस युवक से उसकी शादी होती है, उसके साथ पहली रात गुज़ारता है और दूसरे दिन सुबह-सुबह ही वह मृत पाया जाता है। ऐसा कई नवयुवकों के साथ हुआ और उनकी जान चली गई। जो युवक राजकुमारी संग कोहबर में रात बिताता, सुबह राजकुमारी के शयनकक्ष से उसकी लाश बाहर आती। कल की रात मेरे बेटे की बारी है। वह भी राजकुमारी संग रात गुज़ारेगा और सुबह उसकी लाश मुझे देखने को मिलेगी। यही सोचकर मैं रो रही हूँ।
बुढ़िया की बात सुनकर सोमारू का मन करुणा से भर गया। वह साहसी और परोपकारी स्वभाव का व्यक्ति था। उसने बुढ़िया से कहा, “माता, आपका आज से पहले एक बेटा था। अब मुझे भी अपना बेटा समझो। कल मैं ही भैया के बदले राजकुमारी संग सोने चला जाऊँगा। जब मैं मर जाऊँ तो आपका एक बेटा तो जीवित रहेगा ही। इसलिए माँ मुझे आशीर्वाद दो। यदि मैं जीवित लौट आया तो आपके दो बेटे हो जाएँगे।”
इस पर बुढ़िया ने कहा, “नहीं बेटा! मैं तुम्हें ऐसा नहीं करने के लिए कहूँगी। आख़िर तुम भी तो किसी माँ के ही बेटे हो। मैं अपने बेटे को बचाने के लिए तुम्हें अपना बलिदान नहीं देने दूँगी।”
तथापि सोमारू की ज़िद के आगे बुढ़िया की एक न चली और सबेरा होते ही वह राजमहल की दिशा में चल दिया। राजमार्ग के रास्ते जाते समय उसे केले का बग़ीचा दिखा। उसने अपने पास रखे औज़ार से केले का एक गाछ काट लिया और मनुष्य का आकार तराश कर उसे अपने साथ ले लिया। इन सब साजो-सामान के साथ वह राजा के दरबार में पहुँचा। सिपाहियों ने सूचना दी कि राजकुमारी संग रात बिताने के लिए एक नवयुवक आया है।
सिपाही सोमारू को हवेली में ले गए। उसे स्नानादि के उपरांत नए कपड़े पहनने को दिए गए। उसे नाना प्रकार के स्वादिष्ट भोजन भी परोसे गए। इसके पूर्व ही उसने केले का थम्ह आदि राजकुमारी के कक्ष में रखने को बोल दिया था। अपने घोड़े को भी घोड़सार में बँधवा दिया था।
रात होते ही सोने के लिए राजकुमारी के महल में चल दिया। सोमारू ने केले के थम्ह को राजकुमारी के पांजर में अर्थात बगल में कपड़ा-लत्ता ओढ़ा कर लेटा दिया। ऐसा जान पड़ता था जैसे राजकुमारी संग कोई नवयुवक लेटा हुआ है। स्वयं वह पलंग के नीचे आसन लगाकर बैठ गया।
अहर बीता, पहर बीता, सोमारू ने देखा कि राजकुमारी आराम से सो रही है। जैसे ही आधी रात हुई अर्थात बारह बजते ही उसने देखा कि राजकुमारी की नाक से फुंफकारने की आवाज़ आने लगी। तभी राजकुमारी की नाक से एक नाग निकला और पांजर में रखे केले के थह पर दो हबक्का मारा। सोमारू सावधान होकर यह सब देख रहा था। थम्ह पर हबक्का मारकर नाग राजकुमारी की नाक में जैसे ही घुसने वाला था, सोमारू ने अपने औज़ार से उस नाग के दो टुकड़े कर दिए और उसे पलंग के नीचे रखे झाँपी में झाँप दिया। इसके बाद सोमारू केले के थम्ह को हटाकर स्वयं राजकुमारी के पांजर में लेट गया।
भोर होते ही सिपाही लाश लेने वहाँ आए। दरवाज़ा बंद था और राजकुमारी ने भी उठकर दरवाज़ा नहीं खोला। सिपाहियों ने आवाज़ लगाना शुरू किया, “राजकुमारी जी किवाड़ खोलें।”
तब भीतर से सोमारू ने कहा, “दरवाज़ा देर से खुलेगा। यहाँ राजकुमारी की नींद पूरी नहीं हुई है। मैं भी जीवित हूँ।”
पूरे नगर में शोर हो गया कि राजकुमारी संग सोने वाला युवक जीवित है। सभी नगरवासी यह दृश्य देखने के लिए राजमहल के बाहर इकट्ठा हो गए।
इधर शोर सुनकर राजकुमारी की भी आँखें खुल गईं। वह अब अत्यधिक ख़ुशी अनुभव कर रही थी। उसके माथे में जो भारीपन था वह ख़त्म हो गया। अपने बिस्तर में लेटे युवक को उसने गले लगा लिया।
थोड़ी देर बाद राजा-रानी भी दौड़ते आ गए। महल का फाटक खोला गया। राजकुमारी शर्माते हुए बाहर आईं और सोमारू भी आँखें मलते बाहर निकला जैसे रातभर जागता रहा हो।
वहाँ इकट्ठे सारे नगरवासी सोमारू की जय-जयकार करने लगे। राजा ने सोमारू का विवाह राजकुमारी संग करने की घोषणा की और शुभ मुहूर्त देखकर दोनों का विवाह कर दिया गया। सोमारू ने इस अवसर पर बुढ़िया, उसके बेटे और बहू को बुलाकर उनका हृदय से स्वागत किया और एक इलाका उन्हें दान में दे दिया जिससे वे सुखपूर्वक अपना जीवनयापन कर सकें।
सोमारू तो अपने ससुराल में राजसुख का भोग कर रहा था, पर जब कभी अपने भाई मंगरू की याद आती तो उसका दिल दुख से भर जाता था।
इसी तरह से दिन बीत रहे थे। सोमारू के ससुर अर्थात राजा ने एक दिन उसे बुलाकर कहा कि मेरी तो ले-देकर एक ही बेटी है और यह राज-पाट सारा तुम दोनों के भोग के लिए ही है। इसलिए मैं तुम्हारा राजतिलक कर देता हूँ ताकि मैं राज-काज के झंझट से मुक्त हो जाऊँ और भगवान के भजन में मन लगाऊँ। सोमारू ने राजा की बात सहर्ष मान ली और वह उस राज्य के राजा के रूप में प्रतिष्ठित होकर प्रजापालन में तत्पर हो गया।
सोमारू ने राजा बनने के बाद प्रजा के कष्टों को अपना कष्ट समझकर उनके निवारण में सदैव तत्पर रहने लगा। जब-तब वह राज्य के किसी भी कोने में निकल जाता और प्रजा की परेशानी को देखकर तत्काल उनके कल्याण का उपाय करता था। इससे प्रजा में उसकी लोकप्रियता काफ़ी बढ़ गई। वह जिस किसी भी नगर–गाँव में जाता, उसके दर्शन के लिए लोगों की भीड़ जुट जाती थी। ऐसा इसलिए भी होता था कि सबको आभास हो चला था कि अपने कष्ट, अपनी परेशानी वह सीधे राजा को कहेगा ताकि तत्काल उसका समाधान हो सके जो कि होता भी था।
एक दिन की बात है। राजा सोमारू उसी शहर में पहुँच गया जिस शहर में उसका भाई मंगरू को बंधक बनाकर रखा गया था। इस बात की ख़बर कानों-कान मंगरू तक पहुँची और वह भी राजा से मिलकर अपने कष्ट के निवारण को आतुर हो गया। ठीक समय देखकर वह मालिक के क़ब्ज़े से भाग निकला और राजा को देखने के लिए जो भीड़ जमा थी, उसी भीड़ में घुस गया। उसका मालिक भी पता लगते ही उसके पीछे-पीछे भागा आ रहा था उसे पकड़ने के लिए। अंततः भीड़ में घुसकर उसे पकड़ लिया और उसे लात-मुक्के मारने लगा। उसको डर था कि वह राजा के कर्मचारियों से कहकर मेरा भेद खोल देगा और वह दंड का भागी हो जाएगा।
मंगरू मार खा रहा था और चिल्ला भी रहा था, “बचाओ-बचाओ।” मंगरू की आवाज़ सुनकर कुछ सिपाही दौड़े आए और उसके मालिक को गिरफ़्तार कर लिया। मंगरू और उसके मालिक को सिपाहियों ने राजा के समक्ष पेश किया।
जैसे ही राजा सोमारू ने अपने भाई मंगरू को देखा तो उसकी आँखें भर आईं और ज़ोर से पकड़कर उसके गले मिला। सिपाही यह सब देखकर अवाक् थे। मंगरू ने अपने राजा भाई को सारा हाल कह सुनाया। राजा ने उस मालिक को कठोर दंड देने का और मंगरू को राजमहल चलने का आदेश दिया।
इस तरह से सोमारू और मंगरू दोनों राजसुख भोगने लगे। सोमारू बराबर इस बात का ख़याल रखता था कि मंगरू को कोई परेशानी न हो। इनके राज-काज से प्रजा बहुत सुखी थी। इस तरह से दोनों भाइयों ने सोमारू के नेतृत्व में बहुत दिनों तक राज किया।
mithilanchal mein ek gaanv tha. us gaanv mein do bhai rahte the. ek ka naam tha somaru aur dusre ka naam tha mangru. donon mein bahut pyaar tha aur aapsi talamel bhi bahut tha. donon ek saath hi khate pite the aur rahte the. donon bhaiyon ne ek baar aapas mein vichar vimarsh kiya ki kyon na hum log desh pardesh ghumne ke liye niklen. aisa hi vichar kar donon ne ghoDa taiyar kiya, zaruri saaj saman rakha aur dusre din subah nikalne ki taiyari kar li.
agle din subah subah hi ghoDe par savar hokar donon bhai chal diye deshatan ko. jate jate donon jab thak jate to raste mein kisi chhayadar vriksh ki chhaya mein ek kinare ghoDa bandhakar aur dusre kinare gamchhi bichhakar vishram kar lete. bhojan ke liye jo sattu aur anya thekua pua bhunja aadi lekar chale the, usi se guzara kar lete the. saanjh hote hi vaise hi kisi chhayadar vriksh ke niche raat guzar lete the. aise hi kuch din chalta raha.
ek din donon bhai sandhyakal ek pipal ke peD ke niche apna ashray banaya. kha pikar donon bhai so ge. ghoDa to dusri taraf baandh hi diya tha.
usi pipal ke ek khohaD mein naag nagin vaas karte the. naag ne jaise hi pipal gaachh ke niche do musafir ko aram karte dekha to uska man chataptane laga. wo unko Das kar apna vish utarna chahta tha. lekin nagin dayalu svbhaav ki thi. wo nahin chahti thi ki naag unhen Dase. isliye naag baDi der tak dhairya dharan kar aur man markar chupchap mauqe ki talash mein tha. jab usne dekha ki nagin so gai, tab wo dhire dhire sasar kar aaya aur somaru ko Das liya. iske baad wo vaise hi chupke se nagin ke paas so gaya, jaise usne kuch kiya hi nahin. savera hote hi mangru utha. jab wo somaru ko jagane laga tab usne dekha ki uski saans ruki paDi hai aur uske munh se jhaag nikal raha hai. use ye samajhte der nahin lagi ki kisi kiDe makoDe ne ise Das liya aur somaru ab mrityu ko praapt ho gaya hai.
somaru ke mrit jaan paDte hi mangru rone laga. use kuch soojh nahin raha tha ki wo ab kya kare. achanak use apne bhai ke kriya karm ka dhyaan aaya. usne socha ki nikat ke hi kisi shahr mein jakar ghoDa bechne se jo paisa milega, usi se bhai ka kriya karm kar dunga. aisa sochkar mangru nagar ki or chal diya.
mangru ne apne bhai ki mrityu ka dukh kai logon ke saath bantna chaha par sahayata karna to door sahanubhuti ke do bol bhi koi na bol saka. koi uska ghoDa bhi kharidne ko taiyar na tha. ant mein ek baDe se ghar, jo ki bahut dhanvan vyakti ka lag raha tha, ke darvaze par avaz lagakar malik tak pahuncha. usne apna sara haal kah sunaya. mangru ko aisa laga ki ye dhanvan vyakti mera ghoDa kharid lega.
par wo dhanvan vyakti to aale darje ka dhoort aur kapti nikla. wo samajh gaya ki is shahr mein ye naya vyakti hai aur ye mera kya bigaD lega? usne chhal se ghoDa baandh liya aur mangru ko bhi bandhak bana liya. din raat usse kaam leta aur khane pine ko bhi jaise taise deta tha. hamesha uski nigrani karta rahta tha ki wo kahin bhaag na jaye. mangru ab phans chuka tha.
idhar somaru ka mrit sharir dinbhar usi gaachh ke niche vaise hi paDa raha. nagin ne jab mrit sharir ko dekha to naag ko bahut phatkar lagai ki nirapradh batohi ko kyon Das liya? par ab to kuch ho nahin sakta hai.
sanyog ki baat hai ki vidhi vidhata donon mrityulok ki sair par nikle the aur ratri vishram ke liye usi gaachh par ruke the jiske niche somaru ka mrit sharir paDa tha. vidhi ki nazar achanak niche zamin par paDi to somaru ke us mrit sharir par bhi nazar paD jana svabhavik hi tha. sundar kaya dekhkar vidhi ko daya aa gai. unhonne vidhata se kaha, “dekhiye svami! ye koi sundar yuvak hai aur na jane kis karan se isne apni jaan ganva di hai. iske parivar ke log chintit honge. isliye koi upaay kar ise jivit kar dijiye. ”
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udhar somaru ko jivit dekh vidhi vidhata us gaachh se uDkar aage baDh chale.
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buDhiya ko kabhi rote aur kabhi hanste dekh somaru avak rah gaya. use aisa lag raha tha ki buDhiya kahin pagal to nahin hai. somaru ko kuch samajh nahin aa raha tha. isliye usne buDhiya se puchha, “mataji! abhi to aap mere saath hans hans ke baat kar rahi theen, phir turant rone lagin? akhir kya baat hai? mujhe kuch samajh nahin aa raha hai.
buDhiya ne somaru ko bataya, “beta! mere liye ye baDi khushi ki baat hai ki ek vyvahar kushal aur sundar yuvak mere ghar atithi ke roop mein padhara hai. isliye bahut khush hoon. par dukh ki baat ye hai ki mera ek hi beta hai. uska dviragaman ka din nishchit hai. par durbhagya ki baat hai ki is nagar ki rajakumari pata nahin rakshsi hai ki daitya hai, use roz ek navyuvak bhakshan ke liye chahiye aur kal mere bete ki bari hai. isliye putr viyog mein main ro bhi rahi hoon. ”
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is par buDhiya ne kaha, “nahin beta! main tumhein aisa nahin karne ke liye kahungi. akhir tum bhi to kisi maan ke hi bete ho. main apne bete ko bachane ke liye tumhein apna balidan nahin dene dungi. ”
tathapi somaru ki zid ke aage buDhiya ki ek na chali aur sabera hote hi wo rajamhal ki disha mein chal diya. rajamarg ke raste jate samay use kele ka baghicha dikha. usne apne paas rakhe auzar se kele ka ek gaachh kaat liya aur manushya ka akar tarash kar use apne saath le liya. in sab sajo saman ke saath wo raja ke darbar mein pahuncha. sipahiyon ne suchana di ki rajakumari sang raat bitane ke liye ek navyuvak aaya hai.
sipahi somaru ko haveli mein le ge. use snanadi ke upraant ne kapDe pahanne ko diye ge. use nana prakar ke svadisht bhojan bhi parose ge. iske poorv hi usne kele ka thamh aadi rajakumari ke kaksh mein rakhne ko bol diya tha. apne ghoDe ko bhi ghoDsar mein bandhava diya tha.
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pure nagar mein shor ho gaya ki rajakumari sang sone vala yuvak jivit hai. sabhi nagarvasi ye drishya dekhne ke liye rajamhal ke bahar ikattha ho ge.
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somaru to apne sasural mein rajsukh ka bhog kar raha tha, par jab kabhi apne bhai mangru ki yaad aati to uska dil dukh se bhar jata tha.
isi tarah se din beet rahe the. somaru ke sasur arthat raja ne ek din use bulakar kaha ki meri to le dekar ek hi beti hai aur ye raaj paat sara tum donon ke bhog ke liye hi hai. isliye main tumhara rajatilak kar deta hoon taki main raaj kaaj ke jhanjhat se mukt ho jaun aur bhagvan ke bhajan mein man lagaun. somaru ne raja ki baat saharsh maan li aur wo us rajya ke raja ke roop mein pratishthit hokar prjapalan mein tatpar ho gaya.
somaru ne raja banne ke baad praja ke kashton ko apna kasht samajhkar unke nivaran mein sadaiv tatpar rahne laga. jab tab wo rajya ke kisi bhi kone mein nikal jata aur praja ki pareshani ko dekhkar tatkal unke kalyan ka upaay karta tha. isse praja mein uski lokapriyta kafi baDh gai. wo jis kisi bhi nagar–ganv mein jata, uske darshan ke liye logon ki bheeD jut jati thi. aisa isliye bhi hota tha ki sabko abhas ho chala tha ki apne kasht, apni pareshani wo sidhe raja ko kahega taki tatkal uska samadhan ho sake jo ki hota bhi tha.
ek din ki baat hai. raja somaru usi shahr mein pahunch gaya jis shahr mein uska bhai mangru ko bandhak banakar rakha gaya tha. is baat ki khabar kanon kaan mangru tak pahunchi aur wo bhi raja se milkar apne kasht ke nivaran ko aatur ho gaya. theek samay dekhkar wo malik ke qabze se bhaag nikla aur raja ko dekhne ke liye jo bheeD jama thi, usi bheeD mein ghus gaya. uska malik bhi pata lagte hi uske pichhe pichhe bhaga aa raha tha use pakaDne ke liye. antatः bheeD mein ghuskar use pakaD liya aur use laat mukke marne laga. usko Dar tha ki wo raja ke karmchariyon se kahkar mera bhed khol dega aur wo danD ka bhagi ho jayega.
mangru maar kha raha tha aur chilla bhi raha tha, “bachao bachao. ” mangru ki avaz sunkar kuch sipahi dauDe aaye aur uske malik ko giraftar kar liya. mangru aur uske malik ko sipahiyon ne raja ke samaksh pesh kiya.
jaise hi raja somaru ne apne bhai mangru ko dekha to uski ankhen bhar ain aur zor se pakaDkar uske gale mila. sipahi ye sab dekhkar avak the. mangru ne apne raja bhai ko sara haal kah sunaya. raja ne us malik ko kathor danD dene ka aur mangru ko rajamhal chalne ka adesh diya.
is tarah se somaru aur mangru donon rajsukh bhogne lage. somaru barabar is baat ka khayal rakhta tha ki mangru ko koi pareshani na ho. inke raaj kaaj se praja bahut sukhi thi. is tarah se donon bhaiyon ne somaru ke netritv mein bahut dinon tak raaj kiya.
mithilanchal mein ek gaanv tha. us gaanv mein do bhai rahte the. ek ka naam tha somaru aur dusre ka naam tha mangru. donon mein bahut pyaar tha aur aapsi talamel bhi bahut tha. donon ek saath hi khate pite the aur rahte the. donon bhaiyon ne ek baar aapas mein vichar vimarsh kiya ki kyon na hum log desh pardesh ghumne ke liye niklen. aisa hi vichar kar donon ne ghoDa taiyar kiya, zaruri saaj saman rakha aur dusre din subah nikalne ki taiyari kar li.
agle din subah subah hi ghoDe par savar hokar donon bhai chal diye deshatan ko. jate jate donon jab thak jate to raste mein kisi chhayadar vriksh ki chhaya mein ek kinare ghoDa bandhakar aur dusre kinare gamchhi bichhakar vishram kar lete. bhojan ke liye jo sattu aur anya thekua pua bhunja aadi lekar chale the, usi se guzara kar lete the. saanjh hote hi vaise hi kisi chhayadar vriksh ke niche raat guzar lete the. aise hi kuch din chalta raha.
ek din donon bhai sandhyakal ek pipal ke peD ke niche apna ashray banaya. kha pikar donon bhai so ge. ghoDa to dusri taraf baandh hi diya tha.
usi pipal ke ek khohaD mein naag nagin vaas karte the. naag ne jaise hi pipal gaachh ke niche do musafir ko aram karte dekha to uska man chataptane laga. wo unko Das kar apna vish utarna chahta tha. lekin nagin dayalu svbhaav ki thi. wo nahin chahti thi ki naag unhen Dase. isliye naag baDi der tak dhairya dharan kar aur man markar chupchap mauqe ki talash mein tha. jab usne dekha ki nagin so gai, tab wo dhire dhire sasar kar aaya aur somaru ko Das liya. iske baad wo vaise hi chupke se nagin ke paas so gaya, jaise usne kuch kiya hi nahin. savera hote hi mangru utha. jab wo somaru ko jagane laga tab usne dekha ki uski saans ruki paDi hai aur uske munh se jhaag nikal raha hai. use ye samajhte der nahin lagi ki kisi kiDe makoDe ne ise Das liya aur somaru ab mrityu ko praapt ho gaya hai.
somaru ke mrit jaan paDte hi mangru rone laga. use kuch soojh nahin raha tha ki wo ab kya kare. achanak use apne bhai ke kriya karm ka dhyaan aaya. usne socha ki nikat ke hi kisi shahr mein jakar ghoDa bechne se jo paisa milega, usi se bhai ka kriya karm kar dunga. aisa sochkar mangru nagar ki or chal diya.
mangru ne apne bhai ki mrityu ka dukh kai logon ke saath bantna chaha par sahayata karna to door sahanubhuti ke do bol bhi koi na bol saka. koi uska ghoDa bhi kharidne ko taiyar na tha. ant mein ek baDe se ghar, jo ki bahut dhanvan vyakti ka lag raha tha, ke darvaze par avaz lagakar malik tak pahuncha. usne apna sara haal kah sunaya. mangru ko aisa laga ki ye dhanvan vyakti mera ghoDa kharid lega.
par wo dhanvan vyakti to aale darje ka dhoort aur kapti nikla. wo samajh gaya ki is shahr mein ye naya vyakti hai aur ye mera kya bigaD lega? usne chhal se ghoDa baandh liya aur mangru ko bhi bandhak bana liya. din raat usse kaam leta aur khane pine ko bhi jaise taise deta tha. hamesha uski nigrani karta rahta tha ki wo kahin bhaag na jaye. mangru ab phans chuka tha.
idhar somaru ka mrit sharir dinbhar usi gaachh ke niche vaise hi paDa raha. nagin ne jab mrit sharir ko dekha to naag ko bahut phatkar lagai ki nirapradh batohi ko kyon Das liya? par ab to kuch ho nahin sakta hai.
sanyog ki baat hai ki vidhi vidhata donon mrityulok ki sair par nikle the aur ratri vishram ke liye usi gaachh par ruke the jiske niche somaru ka mrit sharir paDa tha. vidhi ki nazar achanak niche zamin par paDi to somaru ke us mrit sharir par bhi nazar paD jana svabhavik hi tha. sundar kaya dekhkar vidhi ko daya aa gai. unhonne vidhata se kaha, “dekhiye svami! ye koi sundar yuvak hai aur na jane kis karan se isne apni jaan ganva di hai. iske parivar ke log chintit honge. isliye koi upaay kar ise jivit kar dijiye. ”
vidhata ne vidhi se kaha, “dekhiye vidhi, ye mrityulok hai. is lok mein log janm lete hain aur marte hain. aap yadi sabko jivit karne lagenge to mrityulok ka niyam hi khatm ho jayega. ”
phir bhi vidhi baar baar vidhata se us navyuvak arthat somaru ko jivit karne ka agrah karne lagin. vidhi dvara baar baar agrah nivedan ke pashchat vidhata ko unki baat manni paDi. unhonne kuch aisa chakr chalaya ki naag ko jakar somaru ke sharir se vish nikalne ko badhya hona paDa. iske baad somaru jivit ho gaya. wo savera hone ka intzaar karne laga.
udhar somaru ko jivit dekh vidhi vidhata us gaachh se uDkar aage baDh chale.
somaru ko ye dekhkar baDa ashcharya hua ki uska bhai mangru yahan nahin hai. use kuch samajh hi nahin aa raha tha. ujala hote hi wo apne ghoDe par savar hokar apne bhai mangru ki khoj mein nikal paDa. idhar udhar bahut DhunDha par mangru ka koi thaah pata nahin lag raha tha. chalte chalte shaam ho gai thi. yadi raat ho gai to aur musibat ho jayegi. yahi sochkar samne ek ghar dikha, usne socha yahin ruka jaye. us ghar ke bahar ek buDhiya dikhi. somaru ne us buDhiya se kaha, “main to pardesi hoon. yahan ek raat thaharne ki jagah milegi kyaa?” buDhiya ne uska hriday se svagat kiya. uske thoDi der baad hi buDhiya rone gane lagi.
buDhiya ko kabhi rote aur kabhi hanste dekh somaru avak rah gaya. use aisa lag raha tha ki buDhiya kahin pagal to nahin hai. somaru ko kuch samajh nahin aa raha tha. isliye usne buDhiya se puchha, “mataji! abhi to aap mere saath hans hans ke baat kar rahi theen, phir turant rone lagin? akhir kya baat hai? mujhe kuch samajh nahin aa raha hai.
buDhiya ne somaru ko bataya, “beta! mere liye ye baDi khushi ki baat hai ki ek vyvahar kushal aur sundar yuvak mere ghar atithi ke roop mein padhara hai. isliye bahut khush hoon. par dukh ki baat ye hai ki mera ek hi beta hai. uska dviragaman ka din nishchit hai. par durbhagya ki baat hai ki is nagar ki rajakumari pata nahin rakshsi hai ki daitya hai, use roz ek navyuvak bhakshan ke liye chahiye aur kal mere bete ki bari hai. isliye putr viyog mein main ro bhi rahi hoon. ”
somaru ne dhire dhire usse sari baten khod khodkar puchhi aur sab kuch samajh liya. buDhiya ne use ye bhi bataya ki is rajya ka jo raja hai uski ek iklauti beti hai. bahut hi sundar hai rajakumari. par pata nahin kya rahasya hai? jis yuvak se uski shadi hoti hai, uske saath pahli raat guzarta hai aur dusre din subah subah hi wo mrit paya jata hai. aisa kai navayuvkon ke saath hua aur unki jaan chali gai. jo yuvak rajakumari sang kohabar mein raat bitata, subah rajakumari ke shayankaksh se uski laash bahar aati. kal ki raat mere bete ki bari hai. wo bhi rajakumari sang raat guzarega aur subah uski laash mujhe dekhne ko milegi. yahi sochkar main ro rahi hoon.
buDhiya ki baat sunkar somaru ka man karuna se bhar gaya. wo sahasi aur paropakari svbhaav ka vyakti tha. usne buDhiya se kaha, “mata, aapka aaj se pahle ek beta tha. ab mujhe bhi apna beta samjho. kal main hi bhaiya ke badle rajakumari sang sone chala jaunga. jab main mar jaun to aapka ek beta to jivit rahega hi. isliye maan mujhe ashirvad do. yadi main jivit laut aaya to aapke do bete ho jayenge. ”
is par buDhiya ne kaha, “nahin beta! main tumhein aisa nahin karne ke liye kahungi. akhir tum bhi to kisi maan ke hi bete ho. main apne bete ko bachane ke liye tumhein apna balidan nahin dene dungi. ”
tathapi somaru ki zid ke aage buDhiya ki ek na chali aur sabera hote hi wo rajamhal ki disha mein chal diya. rajamarg ke raste jate samay use kele ka baghicha dikha. usne apne paas rakhe auzar se kele ka ek gaachh kaat liya aur manushya ka akar tarash kar use apne saath le liya. in sab sajo saman ke saath wo raja ke darbar mein pahuncha. sipahiyon ne suchana di ki rajakumari sang raat bitane ke liye ek navyuvak aaya hai.
sipahi somaru ko haveli mein le ge. use snanadi ke upraant ne kapDe pahanne ko diye ge. use nana prakar ke svadisht bhojan bhi parose ge. iske poorv hi usne kele ka thamh aadi rajakumari ke kaksh mein rakhne ko bol diya tha. apne ghoDe ko bhi ghoDsar mein bandhava diya tha.
raat hote hi sone ke liye rajakumari ke mahl mein chal diya. somaru ne kele ke thamh ko rajakumari ke panjar mein arthat bagal mein kapDa latta oDha kar leta diya. aisa jaan paDta tha jaise rajakumari sang koi navyuvak leta hua hai. svayan wo palang ke niche aasan lagakar baith gaya.
ahar bita, pahar bita, somaru ne dekha ki rajakumari aram se so rahi hai. jaise hi aadhi raat hui arthat barah bajte hi usne dekha ki rajakumari ki naak se phumphkarne ki avaz aane lagi. tabhi rajakumari ki naak se ek naag nikla aur panjar mein rakhe kele ke thah par do habakka mara. somaru savdhan hokar ye sab dekh raha tha. thamh par habakka markar naag rajakumari ki naak mein jaise hi ghusne vala tha, somaru ne apne auzar se us naag ke do tukDe kar diye aur use palang ke niche rakhe jhanpi mein jhaanp diya. iske baad somaru kele ke thamh ko hatakar svayan rajakumari ke panjar mein let gaya.
bhor hote hi sipahi laash lene vahan aaye. darvaza band tha aur rajakumari ne bhi uthkar darvaza nahin khola. sipahiyon ne avaz lagana shuru kiya, “rajakumari ji kivaD kholen. ”
tab bhitar se somaru ne kaha, “darvaza der se khulega. yahan rajakumari ki neend puri nahin hui hai. main bhi jivit hoon. ”
pure nagar mein shor ho gaya ki rajakumari sang sone vala yuvak jivit hai. sabhi nagarvasi ye drishya dekhne ke liye rajamhal ke bahar ikattha ho ge.
idhar shor sunkar rajakumari ki bhi ankhen khul gain. wo ab atyadhik khushi anubhav kar rahi thi. uske mathe mein jo bharipan tha wo khatm ho gaya. apne bistar mein lete yuvak ko usne gale laga liya.
thoDi der baad raja rani bhi dauDte aa ge. mahl ka phatak khola gaya. rajakumari sharmate hue bahar ain aur somaru bhi ankhen malte bahar nikla jaise ratbhar jagata raha ho.
vahan ikatthe sare nagarvasi somaru ki jay jaykar karne lage. raja ne somaru ka vivah rajakumari sang karne ki ghoshna ki aur shubh muhurt dekhkar donon ka vivah kar diya gaya. somaru ne is avsar par buDhiya, uske bete aur bahu ko bulakar unka hriday se svagat kiya aur ek ilaka unhen daan mein de diya jisse ve sukhpurvak apna jivanyapan kar saken.
somaru to apne sasural mein rajsukh ka bhog kar raha tha, par jab kabhi apne bhai mangru ki yaad aati to uska dil dukh se bhar jata tha.
isi tarah se din beet rahe the. somaru ke sasur arthat raja ne ek din use bulakar kaha ki meri to le dekar ek hi beti hai aur ye raaj paat sara tum donon ke bhog ke liye hi hai. isliye main tumhara rajatilak kar deta hoon taki main raaj kaaj ke jhanjhat se mukt ho jaun aur bhagvan ke bhajan mein man lagaun. somaru ne raja ki baat saharsh maan li aur wo us rajya ke raja ke roop mein pratishthit hokar prjapalan mein tatpar ho gaya.
somaru ne raja banne ke baad praja ke kashton ko apna kasht samajhkar unke nivaran mein sadaiv tatpar rahne laga. jab tab wo rajya ke kisi bhi kone mein nikal jata aur praja ki pareshani ko dekhkar tatkal unke kalyan ka upaay karta tha. isse praja mein uski lokapriyta kafi baDh gai. wo jis kisi bhi nagar–ganv mein jata, uske darshan ke liye logon ki bheeD jut jati thi. aisa isliye bhi hota tha ki sabko abhas ho chala tha ki apne kasht, apni pareshani wo sidhe raja ko kahega taki tatkal uska samadhan ho sake jo ki hota bhi tha.
ek din ki baat hai. raja somaru usi shahr mein pahunch gaya jis shahr mein uska bhai mangru ko bandhak banakar rakha gaya tha. is baat ki khabar kanon kaan mangru tak pahunchi aur wo bhi raja se milkar apne kasht ke nivaran ko aatur ho gaya. theek samay dekhkar wo malik ke qabze se bhaag nikla aur raja ko dekhne ke liye jo bheeD jama thi, usi bheeD mein ghus gaya. uska malik bhi pata lagte hi uske pichhe pichhe bhaga aa raha tha use pakaDne ke liye. antatः bheeD mein ghuskar use pakaD liya aur use laat mukke marne laga. usko Dar tha ki wo raja ke karmchariyon se kahkar mera bhed khol dega aur wo danD ka bhagi ho jayega.
mangru maar kha raha tha aur chilla bhi raha tha, “bachao bachao. ” mangru ki avaz sunkar kuch sipahi dauDe aaye aur uske malik ko giraftar kar liya. mangru aur uske malik ko sipahiyon ne raja ke samaksh pesh kiya.
jaise hi raja somaru ne apne bhai mangru ko dekha to uski ankhen bhar ain aur zor se pakaDkar uske gale mila. sipahi ye sab dekhkar avak the. mangru ne apne raja bhai ko sara haal kah sunaya. raja ne us malik ko kathor danD dene ka aur mangru ko rajamhal chalne ka adesh diya.
is tarah se somaru aur mangru donon rajsukh bhogne lage. somaru barabar is baat ka khayal rakhta tha ki mangru ko koi pareshani na ho. inke raaj kaaj se praja bahut sukhi thi. is tarah se donon bhaiyon ne somaru ke netritv mein bahut dinon tak raaj kiya.
हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी
‘हिन्दवी डिक्शनरी’ हिंदी और हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों के शब्दों का व्यापक संग्रह है। इसमें अंगिका, अवधी, कन्नौजी, कुमाउँनी, गढ़वाली, बघेली, बज्जिका, बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, मगही, मैथिली और मालवी शामिल हैं। इस शब्दकोश में शब्दों के विस्तृत अर्थ, पर्यायवाची, विलोम, कहावतें और मुहावरे उपलब्ध हैं।
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